सुप्रीम कोर्ट और तीस्ता सीतलवाड़ –  एक विश्लेषण, सीए सुरेश कोठारी

<em>सुप्रीम कोर्ट और तीस्ता सीतलवाड़ –  एक विश्लेषण, सीए सुरेश कोठारी</em>


1 जुलाई 2023 दिन शनिवार जिस दिन सुप्रीम कोर्ट  का अवकाश था एक अभूतपूर्व घटना हुई और इस घटना से देश के आम जनमानस के मन में काफी क्रोध , क्षोभ और निराशा है और इस घटनाक्रम ने ऐसे हजारों लाखों आम भारतीय नागरिक जोकि न्याय के लिए वर्षों से न्यायालयों में अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हैं वह अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं ।

यह घटना संबंधित है तीस्ता सीतलवाड़ से,  जो कि एक एनजीओ चलाती है देश की एक जानी-मानी शख्सियत है उन्हें लोग गुजरात दंगों के पश्चात एक पक्ष के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए एक अभियान चलाने के लिए जाना जाता है ।

लेकिन बाद में यह पता चलता है कि उन्होंने झूठे कागजात ,  झूठे एफिडेविट और झूठे सबूतों को गढ़ कर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी को आरोपी बनाने की भरपूर कोशिश कर देश और न्यायालयों  को गुमराह करने का कार्य किया ।

यह आरोप भी है कि तीस्ता सीतलवाड़ ने दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के नाम पर देश और विदेशों से अकूत धन राशि एकत्रित की और उस धनराशि को पीड़ितों को न्याय दिलाने की जगह अपनी निजी महत्वाकांक्षा और निजी उपयोग के लिए व्यय किया ।

तीस्ता सीतलवाड़ को 25 जून 2022 को गुजरात में गिरफ्तार कर लिया गया तथा सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 2 सितंबर 2022 को अंतरिम जमानत दे दी तथा निर्देश दिया है कि वह सक्षम न्यायालय में नियमित जमानत के लिए आवेदन करें ।

उनके नियमित जमानत के आवेदन को 1 जुलाई 2023  को रद्द करते हुए गुजरात हाईकोर्ट में तुरंत आत्मसमर्पण करने को कहा , अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए तीस्ता सीतलवाड़ ने  अपनी अंतरिम जमानत बढ़ाने का आवेदन उसी दिन माननीय उच्चतम न्यायलय के समक्ष प्रस्तुत किया ।

अब चर्चा करें उस अभूतपूर्व घटना की जो उस दिन सुप्रीम कोर्ट में हुई , जैसे ही तीस्ता सीतलवाड़ ने आवेदन जमा किया उसके कुछ ही देर बाद उच्चतम न्यायलय के दो माननीय न्यायधीशों जस्टिस प्रशांत मिश्रा और माननीय जस्टिस ए एस ओका की अवकाश कालीन पीठ के सामने शाम 6.30 समय सुनवाई के लिए समय नियत कर दिया गया ।

यहां पर यह बताना जरूरी होगा कि 2 जुलाई 2023 तक सुप्रीम कोर्ट में ग्रीष्मावकाश था और केवल अवकाश कालीन पीठ ही कार्य कर रही थी , ग्रीष्मावकाश में अवकाश कालीन पीठ केवल महत्वपूर्ण प्रकरण की हि सुनवाई करती है, और चूंकि उस दिन शनिवार था अत: उस दिन तो सुप्रीम कोर्ट बंद भी था।

सबसे रोचक बात यह है कि दो न्यायाधीशों की पीठ  में मतैक्य नहीं होने के कारण जब यह प्रकरण माननीय मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया उस समय माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री डी वाई चंद्रचूड़ , सुप्रीम कोर्ट के बहुत सारे वर्तमान और पूर्व न्यायधीश  , बहुत सारे वरिष्ठ वकील और भारत के सॉलीसीटर जनरल श्री  तुषार मेहता एक कार्यक्रम में थे , यह कार्यक्रम कुछ दिनों पहले ही  वकील से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बने श्री के वी विश्वनाथ की बेटी सुवर्णा विश्वनाथ का एक भरतनाट्यम का कार्यक्रम था ।

भारतनाट्यम के इस कार्यक्रम का आनंद लेते हुए  जैसे ही माननीय मुख्य न्यायाधीश को  तीस्ता सीतलवाड़ के प्रकरण के बारे के सूचना मिली तो माननीय मुख्य न्यायाधीश भरतनाट्यम के कार्यक्रम से उठकर बाहर जाते है और किसी से फोन पर बात करने लगते है और कहा जाता है कि ऐसा तीन बार हुआ ।

अंतिम फोन के  पश्चात वह पुनः इस कार्यक्रम मे  आ गए और इस कार्यक्रम के समाप्त होने के पश्चात उन्होंने उसी कार्यक्रम में मौजूद माननीय न्यायाधीश  बीआर गवाई और न्यायाधीश ए एस बोपन्ना से बात की , तत्पश्चात उन्होंने  माननीय न्यायाधीश बी आर गवई , न्यायाधीश केएस बोपन्ना और न्यायाधीश  दीपांकर दत्ता की तीन न्यायधीशों की बेंच का गठन किया  जिसकी सुनवाई का समय शाम 9:15 नियत किया जाता है और सुनवाई के बाद उन्हें 7 दिनों की अंतरिम जमानत भी दे दि जाती है।

अहमदाबाद में जमानत रद्द होने के कुछ हि घंटो बाद दो न्यायाधीशों के समक्ष सुनवाई , उसके कुछ ही देर बाद माननीय मुख्य न्यायधीश महोदय द्वारा तीन न्यायधीश की पीठ का गठन , उस पीठ द्वारा उसी दिन सुनवाई और त्वरित निर्णय , एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह कई वर्षों की प्रक्रिया है , शायद पूरी उम्र ही निकल जाए ।

भारत के मुख्य न्यायधीश का किसी प्रकरण के बारे में इतनी सदाशयता दिखाना काफी अच्छी बात है , लेकिन यह सदाशयता केवल एक व्यक्ति विशेष के प्रकरण में दिखाना , मेरी तरह देश के अधिसंख्य लोगो को शायद पसंद नहीं आया ।

मैं यहां पर केवल यह रेखांकित करना चाहता हुं कि एक व्यक्ति विशेष के प्रकरण के लिए भारत के मुख्य न्यायधीश का एक निजी और पारिवारिक कार्यक्रम में से बार बार उठकर बात करना और पीठ गठित करना अपने आप में एक दुर्लभ घटना  है , यहां कोई लोकहित का ऐसा विषय नहीं था या कोई संवैधानिक संकट की भी स्थिति नहीं थी ,  जिसकी सुनवाई इतनी अति आवश्यक हो ।

बल्कि यह एक ऐसे आरोपी के बारे में था जिसके ऊपर धोखा धडी का प्रकरण था तथा वह  आरोपी पिछले दस महीने से अंतरिम जमानत पर था , इतने लंबे समय तक किसी आरोपी का अंतरिम जमानत पर बाहर रहना यह भी अपने आप में एक दुर्लभ घटना है  ।

ऐसा विशेषाधिकार किसी व्यक्ति विशेष को ही क्यों मिलता है यह आम जन मानस , सरकार और न्यायपालिका के लिए भी एक सोचनीय विषय है।

देश के आम जन मानस की गहन और अटूट विश्वास न्यायपालिका के प्रति है ऐसी घटनाओं के कारण न्यायपालिका के प्रति उनका  विश्वास  कम होता है क्योंकि वह जब वह देखता है कि एक ओर इतना त्वरित न्याय और दूसरी ओर देश का सामान्य नागरिक , जो कि वर्षों ठोकर खाने के बाद भी अपनी याचिका को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध तक नहीं करवा पाता , वरन कई नागरिक तो अपनी बारी आने की प्रतीक्षा करते हुए  मृत्यु को भी प्राप्त हो चुके होते हैं ।

आखिर इतनी तीव्र गति से सुनवाई का क्या कारण है क्या इसलिए कि तीस्ता सीतलवाड़ के दादा एमसी सीतलवाड़ भारत के प्रथम अटार्नी जनरल थे या फिर तीस्ता सीतलवाड़ योजना आयोग की सदस्य थी ,या फिर उन्हें 2007 में पद्मश्री मिला , या फिर उनका यूपीए सरकार के समय एक तरह का छाया मंत्रिमंडल , राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा गठित एक समिति का सदस्य होना , जिनका कार्य सांप्रदायिक हिंसा निवारण अधिनियम का मसौदा बनाना था , क्या इन सब विशेषताओं के कारण उच्चतम न्यायायलय  ने त्वरित गति से सुनवाई की , इसका उत्तर तो उच्चतम न्यायालय हि दे सकता है ।

सुनवाई के दौरान जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कोर्ट ने उनसे उनका मत पूछा तो उत्तर में तुषार मेहता ने  कहा कि  एक सामान्य व्यक्ति के साथ जिस तरह का व्यवहार किया जाता है उसी तरह का व्यवहार यहां होना चाहिए  , क्योंकि उन्हें भी लगा इतनी त्वरित गति से किसी व्यक्ति विशेष सुनवाई होना अन्य  याचिकाकर्ताओं के साथ अन्याय है । 

साथियों  सामान्यता सुप्रीम कोर्ट से कानून और संविधान की जटिलताओं से संबंधित मामलों का प्राथमिकता से निस्तारण करने की अपेक्षा की जाती है 1 जून 2023 को 433  इस तरह के मामले सुप्रीम कोर्ट में  काफी समय से लंबित है , जिसमें से 43 मुख्य मामले हैं तथा 390 उनसे संबद्ध मामले हैं अगर इन 43 मामलों का निस्तारण कर लिया जाए तो बाकी 390 प्रकरणों का निस्तारण भी अपने आप हो जाता है , इन प्रकरणों का निपटान माननीय उच्चतम न्यायालय को प्राथमिकता के साथ करने की अपेक्षा की जाती है।किसी भी जनहित के विषय  जिसका  प्रभाव अधिसंख्य नागरिकों के उपर पड़ता है , ऐसे प्रकरणों  की सुप्रीम कोर्ट में त्वरित सुनवाई होने की अपेक्षा है ।

मैं आपके सामने सुप्रीम कोर्ट के दो प्रकरण का उदाहरण दे रहा हु ताकि सुप्रीम कोर्ट की प्राथमिकता के बारे आप अपना मत बना सके

भोपाल गैस काण्ड के पीड़ितों को अतिरिक्त क्षतिपूर्ति के केस का निर्णय देने में सुप्रीम कोर्ट ने 12 साल लगा दिए

जबकि 22 नवंबर 2022 को समलैंगिक विवाह के संबंध में प्रस्तुत याचिका पर पांच न्यायधीशों की संवैधानिक पीठ दस दिन सुनवाई कर 11 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया

आपके लिए यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि  1 जून 2023 को सुप्रीम कोर्ट में  68745 प्रकरण लंबित थे ।

यह सत्य है कि माननीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के पास विवेकाधीन अधिकार है जिससे वह निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है कि वह किस याचिका की सुनवाई कब करें , लेकिन भारत की आम जनता माननीय न्यायाधीशों से यह अपेक्षा करती है अपने विवेकाधीन अधिकारों का उपयोग आम जनमानस के ऊपर व्यापक प्रभाव डालने वाले प्रकरणों पर  करें ।

सामान्यतया कहा जाता है कि विवेकाधीन अधिकारों का प्रयोग कम से कम और अत्यंत आवश्यक होने पर ही करना चाहिए , अत्यधिक विवेकाधीन अधिकारों का प्रयोग कदाचरण की तरफ ले जा सकता है ।

इस प्रकरण से यह तो निश्चित हो जाता है  कि  तीस्ता सीतलवाड़ बहुत प्रभाशाली है ,इतनी ज्यादा की  भारत में कई उच्च पदों पर आसीन और प्रभावशाली लोगों के प्रकरण भी सुप्रीम कोर्ट में शायद हि इतनी प्राथमिकता से सुने जाए , तीस्ता सीतलवाड़ को 1जुलाई को 7 दिन की अंतरिम जमानत मिलने के बाद  फिर से 5 जुलाई को सुनवाई हुई और उनकी अंतरिम जमानत 19 जुलाई तक बढ़ा दी गई ।

साथियों ऐसे सारे संस्थान  जिनके प्रति भारत की जनता का आस्था और विश्वास हो , उनका आचरण और कार्यशैली ऐसा हो की जनता का विश्वास उनके प्रति बढ़ना चाहिए ।

आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा

सीए सुरेश कोठारी
दुर्ग
छत्तीसगढ़
9425246039