प्रेम का उच्चतम शिखर गुरु गोविंद से शिष्य का प्रेम – स्वामी कृष्णानंद, सदगुरु धाम आश्रम गौरखेड़ा में तीन दिवसीय गुरु पूर्णिमा महोत्सव पौधारोपण के साथ प्रारंभ

<em>प्रेम का उच्चतम शिखर गुरु गोविंद से शिष्य का प्रेम – स्वामी कृष्णानंद, सदगुरु धाम आश्रम गौरखेड़ा में तीन दिवसीय गुरु पूर्णिमा महोत्सव पौधारोपण के साथ प्रारंभ</em>


भिलाई नगर 29 जून । सदगुरु धाम आश्रम गौरखेड़ा में तीन दिवसीय गुरु पूर्णिमा महोत्सव पौधारोपण , सुंदरकांड और यज्ञ के साथ प्रारंभ हुआ । प्रथम दिवस के कार्यक्रम में समय के सद्गुरु स्वामी श्री कृष्णानंद जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में भक्तों को गुरु और शिष्य के संबंध में समझाया और बताया की प्रेम का उच्चतम शिखर यदि कोई है तो वह गुरु गोविंद से शिष्य का प्रेम है, हम अपने असामान्य जीवन में प्रेम को और प्रेम के महत्व को भूलते जा रहे हैं ।

जिसके वजह से मनुष्य भांति भांति के समस्या, अवसाद और तनाव से घिर रहा है। क्योंकि वह प्रेम के स्रोत से कटता जा रहा है। स्वामी जी ने बताया की प्रेम का स्रोत कहीं और नहीं हमारे अंतर में हैं और वही अंतर्यात्रा कराने के लिए गुरु इशारा करता है , मार्गदर्शन करता है| स्वामी जी कबीर साहब की वाणी और संतों की वाणी के माध्यम से निरंतर समझाते आ रहे हैं कि गुरु वह है जो शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाएं, स्वामी जी ने गुरु अमरदास जी की कथा के माध्यम से समझाया कि जब शिष्य की भक्ति और गुरु प्रेम प्रगाढ़ हो जाता है तो शिष्य को अपने किए हुए कर्म वह उसके मिटने की चिंता नहीं होती अपितु वह जितने बार भी कर्म करता है वह उसे गुरु चरणों में पुष्पांजलि की तरह अर्पण कर देता है कार्यक्रम में भक्तों ने श्री राम कथा का श्रवण किया जिसमें परिवार और परिवार से परमात्मा तक की यात्रा के बारे में समझा ।

गृहस्थाश्रम आश्रम में बाल पकने लगे तो समझे अब परमात्मा का कार्य करना है

गुरु पूर्णिमा महोत्सव के द्वितीय दिवस पर समय के सद्गुरु स्वामी श्री कृष्णानंद जी महाराज ने कहा कि आप जब तपस्वी होते हैं पाक साफ होते हैं तो बहुत लोग आपके लिए प्रार्थना करते हैं | स्वामी जी ने भगवान राम जी का उदाहरण देते हुए बताया कि जब भगवान राम को वनवास मिला तब राम के लिए बहुत लोगों ने प्रार्थना की। पूरी अयोध्या ही नहीं पूरा संसार प्रार्थना करने लगा| वह जिस रास्ते से गुजरते थे उस रास्ते से लोग प्रार्थना करते थे कि मेरी आयु लग जाए कोई, कहता था मेरी तपस्या लग जाए, कोई कहता था मेरा राज ले लिजिए और यहां रह जाइए, राज्य सुख भोगिए | स्वामी जी ने प्रकाश डाला की जब हम राम की तरह धर्म पद पर निकलते हैं तो लोभ लालच मिलता है जिसे ही रिद्धि सिद्धि कहते हैं, तो गुरु भक्तों के लिए उचित यही है की जो गुरू आदेश दिया है उसी पथ पर आगे बढ़े इसी प्रकार भक्त गुरु अनुकंपा से सफल हो , मुक्त हो जाता है| आगे स्वामी जी ने पुराणिक राजा राज्यवर्धन जी का उदाहरण देकर समझाया कि गृहस्थाश्रम के बाद जब बाल पकने लगे तो समझ जाना चाहिए कि अब धर्म और समाज के लिए परमात्मा के कार्य में आगे आने का समय हो गया है| कार्यक्रम में मां आदिश्री द्वारा श्री राम कथा के माध्यम से भगवान राम के गुरु भक्ती पर प्रकाश डाला |