बिना अनुशासन के नहीं मिलती सफलता, आगे बढऩे के लिए हर चीज में संयम और धैर्य जरूरी, तीन असफलता के बाद भी डॉक्टर बनी भिलाई की रोशनी की सफलता की कहानी

बिना अनुशासन के नहीं मिलती सफलता, आगे बढऩे के लिए हर चीज में संयम और धैर्य जरूरी, तीन असफलता के बाद भी डॉक्टर बनी भिलाई की रोशनी की सफलता की कहानी


बिना अनुशासन के नहीं मिलती सफलता, आगे बढऩे के लिए हर चीज में संयम और धैर्य जरूरी, तीन असफलता के बाद भी डॉक्टर बनी भिलाई की रोशनी की सफलता की कहानी

भिलाई नगर 12 जून । परिवार में कोई डॉक्टर नहीं होने के कारण पिता बचपन से चाहते थे कि उनकी दोनों बेटियां बड़ी होकर डॉक्टर बने। इसलिए बचपन से ही उन्होंने डॉक्टर्स की तरह ट्रीट करना शुरू कर दिया था। बड़ी बहन को मेडिकल एंट्रेस की तैयारी करता देख मैं भी उनके साथ पढ़ती थी। पापा के सपने के साथ धीरे-धीरे रुचि बढ़ती गई। ये कहानी है भिलाई की डॉ. रोशनी पांडेय की जिन्होंने लगातार तीन साल असफलता देखकर भी अपना धैर्य नहीं खोया और कड़ी मेहनत से अपने मंजिल तक पहुंच गई। डॉ. रोशनी ने बताया कि शुरूआत में बहुत डर लगता था जनरल कैटेगरी और सीटें कम होने से सोचती थी कि पता नहीं मेरा सलेक्शन होगा भी की नहीं। इसी बीच जब दीदी का मेडिकल एंट्रेस में सलेक्शन हो गया तो थोड़ी हिम्मत मिली। 12 वीं बोर्ड के बाद लगातार तीन साल ड्रॉप लेकर तैयारी की, साल 2016 में नीट क्वालिफाई कर लिया। मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के दौरान मेरा अनुभव कहता है कि जीवन में आगे बढऩे के लिए अनुशासन बहुत जरूरी है। पढ़ाई से लेकर सभी काम में अगर आपने अनुशासन का पालन किया तो सफलता एक न एक दिन जरूर मिलती है। मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ कि पूरी तैयारी के बाद भी एग्जाम से ठीक पहले तबीयत बिगड़ जाती थी। दो साल इसलिए ठीक से पेपर नहीं दे पाई। बाद मैं पैरेंट्स और टीचर की सलाह पर पढ़ाई के साथ-साथ सेहत का भी ख्याल रखा और अपने आप को टूटने नहीं दिया, क्योंकि मैं जानती थी कि मेरी मेहनत का फल जरूर मिलेगा। 

निराशा से उबरकर पढऩा सीखा

डॉ. रोशनी ने बताया कि मेडिकल एंट्रेस में लगातार असफलता और ड्रॉप इयर बढऩे के साथ निराशा भी हावी होने लगी थी। ऐसे में सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर ने काफी मोटिवेट किया। पैरेंट्स भी कहते थे कि ड्रॉप इयर की चिंता मत करो बस पढ़ाई पर फोकस रहो। ऐसे में निराशा से उबरकर पढऩे की कोशिश करती थी।  11 वीं में प्लेन बायो लिया था जब मेडिकल एंट्रेस की पढ़ाई शुरू की उस वक्त फिजिक्स में बहुत दिक्कत होती थी। कई बार तो ऐसा लगता कि फिजिक्स की वजह से कहीं मैं डॉक्टर बनने से न चूक जाऊं। फिजिक्स को स्ट्रांग करने के लिए उसे ज्यादा वक्त देती थी। जहां परेशानी होती वहां बड़ी दीदी भी गाइड किया करती थी। 

सचदेवा में जाकर सीखा पढ़ाई के साथ अनुशासन

डॉ. रोशनी ने बताया कि उनकी बड़ी बहन और उन्होंने सचदेवा कॉलेज भिलाई से मेडिकल एंट्रेस की तैयारी की। सचदेवा सही मायने में सिर्फ एक कोचिंग न होकर जिंदगी की अनोखी पाठशाला है। यहां हर चीज में अनुशासन सिखाया जाता है। चाहे पढ़ाई हो या फिर टेस्ट या अन्य कोई गतिविधि। टीचर्स भी इतने फ्रेंडली हैं कि उनके साथ पढ़ते वक्त बोरिंग फिल नहीं होता। यहां का सलेक्टिव स्टडी मटेरियल और टेस्ट सीरिज पूरे छत्तीसगढ़ में फेमस है। साथ ही सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर की मोटिवेशन क्लास और हर बच्चे के लिए डेडीकेशन उन्हें बेहद खास बनाता है। आज भी जब मैं सचदेवा के दिनों को याद करती हूं तो लगता है कि जीवन में अगर कुछ भी हासिल कर पाई तो वो सचदेवा की बदौलत है। एग्जाम के दौरान होने वाले प्रेशर को हेंडल करना। लगातार पढ़ाई के बाद डिप्रेशन को खुद पर हावी नहीं होने देना ये सब सचदेवा के टीचर्स बखूबी बच्चों को सिखाते हैं। 

धैय रखना होगा

नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स से कहना चाहूंगी कि सिर्फ पढऩा काफी नहीं है। पढऩे के साथ धैय रखना भी सीखना होगा। हार्ड वर्क का कोई विकल्प नहीं है। हार्ड वर्क के साथ स्मार्ट वर्क भी करना है। हर टेस्ट को गंभीरता से लेकर पढ़ाई करें। खुद को ऑप्शन देने से बचना चाहिए। अगर आपने खुद को दूसरे कोर्स का ऑप्शन दे दिया तो मंजिल कभी नहीं मिलेगी। हमेशा अपने टीचर्स और पैंरेट्स की बातों पर विश्वास करें। उनसे बड़ा जीवन में कोई दूसरा शुभचिंतक नहीं हो सकता।