चार घंटे एक ही क्लास में बैठकर पढऩा लगता था बोरिंग, चाहकर भी नहीं आता था डेडिकेशन, दो साल फेल होने पर समझ में आया अगर जिंदगी बदलेगी तो सिर्फ एजुकेशन से

चार घंटे एक ही क्लास में बैठकर पढऩा लगता था बोरिंग, चाहकर भी नहीं आता था डेडिकेशन, दो साल फेल होने पर समझ में आया अगर जिंदगी बदलेगी तो सिर्फ एजुकेशन से


बढ़ते ड्रॉप के साथ पढऩे का तरीका भी बदला, जरूरत पडऩे पर बिना हिचके पूछता था सवाल

भिलाईनगर 20 सितंबर | कई लोगों का बचपन से सपना होता है डॉक्टर बनने का लेकिन आज हम अंबिकापुर के रहने वाले एक ऐसे डॉक्टर से आपको रूबरू करवा रहे जिन्होंने 12 वीं बोर्ड देने के बाद अपना लक्ष्य तय किया। एमबीबीएस के बाद रायपुर मेडिकल कॉलेज से पीजी कर रहे डॉ. दिव्यानंद मिश्रा को एक ही क्लास में 4 घंटे बैठकर पढऩा काफी बोरिंग लगता था। कभी कभी उन्हें टीचर्स पर बहुत गुस्सा आता था कि आखिर ये जाने क्यों नहीं दे रहे सोचकर। समय के साथ न सिर्फ डॉ. दिव्यानंद का डेडीकेशन बढ़ा बल्कि जीवन को एक नई दिशा भी मिली है। अपनी स्टूडेंट लाइफ का जिक्र करते हुए डॉ. दिव्यानंद कहते हैं कि मैं लाइफ को ज्यादा बोझिल नहीं बनाना चाहता था। इसलिए दिमाग को हल्का रखकर हर काम करता। बायो विषय के साथ 12 वीं बोर्ड दिया तब दोस्तों और टीचर्स से पता चला कि मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के लिए घर से बाहर निकलना पड़ेगा। पिता जी पेशे से टीचर हैं ऐसे में उन्होंने अपने हिसाब से कॅरियर चुनने की आजादी भी दे दी। मैं बैग पैककर भिलाई आ गया। 

शुरूआत में  कोचिंग में पढ़ाई में मन नहीं लगता। पहले ड्रॉप इयर में फेल्यिर हाथ लगा। इस दौरान कई दोस्त सलेक्ट हो गए। तब लगा कि पढ़ाई के लिए थोड़ा सीरियस होना पड़ेगा। पिछले साल की गलतियों को नोटकर उन्हें सुधारने में जुट गया। कोचिंग बदलकर नए सिरे से पढ़ाई शुरू की। दूसरे ड्रॉप में एक हजार रैंक इम्प्रूव हुआ तो थोड़ी हिम्मत मिली। फिर तीसरे साल ड्रॉप के साथ ही मन में ठान लिया था कि इस बार पीएमटी क्वालिफाई करना है। किसी भी तरह के भटकाव से बचकर सिर्फ पढ़ाई में मन लगाया। इसी का नतीजा था कि साल 2010 में सीजी पीएमटी क्वालिफाई किया। उतार-चढ़ाव भरे इस सफर से एक बात जरूर सीखने मिली लोग अपको सुविधा उपलब्ध करा सकते हैं लेकिन पढऩा खुद को है। कोई आपको पढऩा नहीं सीखा सकता। बिना सेल्फ मोटिवेशन के आगे बढऩा भी संभव नहीं है। 

घरवालों ने नहीं दिया कभी प्रेशर

अक्सर परिवार ड्रॉप बढऩे के साथ बच्चों को फील्ड चेंज करने या फिर कुछ और ज्वाइन करने के लिए प्रेशर करने लगते हैं। मेरे साथ बिल्कुल उल्टा था। पापा हमेशा कहते थे कि अगर तुम कर सकते हो उस काम के लिए जी जान लगा दो। डॉ. दिव्यांनद ने बताया कि मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के दौरान फिजिक्स में थोड़ी दिक्कत होती थी। फिजिक्स को कठिन मानकर मन में बैठाने की जगह इसे साल्व करना शुरू किया। यही चीजें बाकी विषयों के साथ भी की। इसलिए तीसरे ड्रॉप में अपने आप ही कॉन्फिडेंस बिल्ड हो गया था। तीन साल के ड्रॉप इयर में खुद को कभी निराश होने नहीं दिया। साल 2007 में न इंटरनेट के सुविधा थी और न ही ज्यादा पैसे। ऐसे में साइकिल या कभी-कभी पैदल कोचिंग आना जाना करता था। साथ ही एक बात हमेशा दोहराता था कि मुझे पीएमटी क्वालिफाई करके ही घर जाना है। शायद इसी एटीट्यूट की वजह सफलता के करीब पहुंच पाया। 

सचदेवा की क्लास टाइमिंग से मिला डेडिकेशन

हर विषय की अलगअलग कोचिंग की भागदौड़ से थककर सेकंड ड्रॉप में सचदेवा ज्वाइन करने वाले डॉ. दिव्यानंद ने बताया कि सचदेवा में आकर ही वे पढ़ाई के प्रति डेडिकेट हुए। यहां सभी विषयों की एक ही छत के नीचे पढ़ाई होती है। ऐसे में बोर लगने के बावजूद चार घंटे क्लास में बैैठना ही पढ़ता था। सारे स्टूडेंट्स को पढ़ते देख अपने आप पढ़ाई में मन लगने लगा। टेस्ट सीरिज के दौरान कॉम्पिटिशन का बहुत अच्छ माहौल बनता था। सचदेवा के टीचर्स काफी फ्रेंडली और हेल्पिंग है। इसलिए सवाल या फिर डाउट पूछने में कभी झिझक नहीं होती थी। सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर की कई मोटिवेशन बातें मन में गहरी छाप छोड़ती थी। 

केवल सिलबेस नहीं अपना दायरा बढ़ाकर पढऩा है

नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स से कहना चाहूंगा कि केवल सिलेबस के हिसाब से नहीं बल्कि अपना दायरा बढ़ाकर पढ़ाई करना चाहिए। इंटरनेट के जमाने में पेपर सेट करने वाले के पास कई ऑप्शन है। ऐसे में आपको भी हर चीज को पढऩा पड़ेगा। ये कठिन है इसे नहीं पढ़ते इस एटीट्यूट को बदलना पड़ेगा। पढ़ाई के साथ-साथ फिजिकल और मेंटल हेल्थ का भी ध्यान रखना है।