लोग कहते थे डॉक्टर बनना छोटे शहर के स्टूडेंट के बस की बात नहीं, सपना ही रह जाएगा, माता-पिता का सपना पूरा करने तीन साल तक नहीं चलाई बाइक, साइकिल से रोज जाता था कोचिंग पढ़ें अमित की सफलता की कहानी
भिलाई. सूरजपुर के मध्यमवर्गीय परिवार में रहने वाले डॉ. अमित कुमार सोनी ने माता-पिता के डॉक्टर बनने का सपना पूरा करने के लिए तीन साल तक बाइक नहीं चालाई। लोग कहते थे डॉक्टर बनना छोटे शहर के छात्रों के बस की बात नहीं उनकी बातें सुनकर लगता था कि कहीं डॉक्टर बनना सपना तो नहीं रह जाएगा। कड़ी मेहनत और लगन से साल 2014 में नीट क्वालिफाई करके आखिरकर अमित ने लोगों की बातों को गलत साबित कर दिया। अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए डॉ. अमित कहते हैं कि 12 वीं बोर्ड के बाद ड्रॉप लेकर जब पहली बार मैं भिलाई पहुंचा तो यहां का माहौल मेरे लिए फिल्मों की तरह था। छोटे शहर से होने के कारण कई बार मैं कोचिंग में साथ में पढऩे वाले बाकी स्टूडेंट से ठीक से बात नहीं कर पाता था। अजीब सी हेजिटेशन फील होती थी। वहीं इंग्लिश मीडियम के 90 पर्सेंट वाले स्टूडेंट्स को तैयारी करते हुए देखकर लगता था कि पता नहीं मैं कभी नीट क्वालिफाई कर पाऊंगा भी की नहीं। इन विपरीत परिस्थितियों के बीच माता-पिता का सपना हमेशा दिमाग में घूमता रहता था। शायद यही एक पॉजिटिव सोच थी जिसके कारण मैं तीन ड्रॉप के बाद भी टूटा नहीं और अपनी मंजिल तक पहुंच गया। नीट की इस परीक्षा ने टफ सिचुएशन में भी सरवाइव करना सीखा दिया जो अभी भी काम आ रहा है।
इकलौता लड़का था घर वाले नहीं भेजना चाह रहे थे बाहर
डॉ. सोनी ने बताया कि वे अपने घर में इकलौते बेटे थे। घर वाले डॉक्टर तो बनाना चाहते थे लेकिन किसी भी सूरत में बाहर पढऩे के लिए नहीं भेजना चाहते थे। वे सोचते थे कि लड़का बाहर रहकर बिगड़ जाएगा। ठीक से पढ़ाई भी नहीं करेगा। परिवार की इस सोच पर मां ने विराम लगा दिया। घरवालों को किसी तरह मां ने मनाया तब जाकर मैं कोचिंग करने के लिए पहुंचा पर यहां भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ। पहली बार घर से बाहर निकलकर अकेले पीजी में रहना, अपना सारा काम करना और पढ़ाई करने में काफी मुश्किल होती थी। घर की बहुत याद आती थी कभी-कभी इतना डिप्रेस हो जाता था कि पढ़ते वक्त रोने लगता था। धीरे-धीरे दोस्तों के साथ रहकर मैंने पढ़ाई पर फोकस किया। पहला ड्रॉप तो सिलेबस और बेसिक को समझने में निकल गया। जब दूसरे ड्रॉप में पूरी तैयारी के साथ उतरा तो महज कुछ नंबरों से मेडिकल एंट्रेस क्वालिफाई करने से चूक गया। इस असफलता ने अंदर तक तोड़ दिया था। मां ने हौसला दिया और तीसरा ड्रॉप लेकर नए सिरे से तैयारी करने की सलाह दी। अपनी असफलता के चलते तीसरे ड्रॉप में मैं घरवालों से बात भी नहीं करता था। पूरा दिन सिर्फ पढ़ाई में लगा रहता था।
जैन सर की बातें सुनकर सीखा खुद के लिए ताली बजाना
सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज से मेडिकल एंट्रेस की कोचिंग करने वाले डॉ. अमित कहते हैं कि सचदेवा को कोचिंग के लिए चुनना मेरे जीवन का सबसे अच्छा डिसिजन था। जब भी मैं निराश होता था जैन सर की मोटिवेशनल क्लास अटेंड कर लिया करता था। उनकी खुद के लिए ताली बजाने वाली बात मुझे बहुत अच्छी लगती थी। वे हमेशा कहते थे कि आप दूसरों से अपनी तुलना मत कीजिए। अपना कॉम्पिटीटर खुद बनिए। लोग क्या कर रहे हैं, क्या कह रहे हैं, इन बातों पर ध्यान मत दीजिए। बस अपना पूरा फोकस पढ़ाई पर रखना है। सचदेवा में आकर ही मैंने टाइम मैनेजमेंट और अकेले रहकर संघर्ष करना सीखा। यहां की फैकल्टी बहुत अच्छी है। इसके अलावा टेस्ट सीरिज में अपनी तैयारी को परखने का मौका मिलता है। माहौल हेल्दी और फ्रेंडली है।
बाहर निकलकर माइंड नहीं करना है डायवर्ट
नीट की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स से कहना चाहता हूं कि यदि आपको कोचिंग के लिए बाहर जाना पड़ता है तो आप अपना माइंड डायवर्ट मत करना। दूसरे शहर में एडजेस्ट करने में थोड़ी दिक्कत तो होती लेकिन अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रहे तो सब मुश्किल आसान हो जाता है। टीचर्स की बातों को फॉलो करें। निराश होकर पढ़ाई छोडऩे की गलती कभी नहीं करनी हैं क्योंकि हमें लाखों की भीड़ में सिर्फ एक सीट खुद के लिए चाहिए। इसलिए अपनी क्षमताओं का पहचानकर लगे रहना है सफलता जरूर मिलेगी।

