सीजी न्यूज ऑनलाइन, 02 सितंबर 2026 । इसका असली मकसद यह है कि देश में सब जगह एक ही कानूनी समय दिखे। इससे साइबर अपराध रुकेंगे, जांच आसान होगी और बिजली या बैंक जैसी जरूरी सेवाएं अधिक सुरक्षित होंगी।
पूरा देश एक ही समय पर चले इसके लिए नए नियम बनाए गए हैं। हालांकि भारत में पिछले कई दशकों से ‘भारतीय मानक समय’ (IST) का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन अब नए नियमों (लीगल मेट्रोलॉजी रूल्स, 2026) के तहत इसे कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया गया है। इसका मतलब है कि देश के सभी सरकारी विभागों, कंपनियों और प्रणालियों को अपनी घड़ियों IST से मिलाना होगा और इसके अनुसार काम करना होगा।
राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (CSIR-NPL) की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पूनम अरोड़ा ने बताया कि सटिक समय (ट्रेसेबल समय) होता क्या है, इसकी जरूरत क्यों है, और इसका इसरो (ISRO) एवं स्वदेशी नैविगेशन प्रणाली ‘NavIC’ से क्या लेना-देना है।
डॉ.पूनम ने बताया कि नए नियम का मकसद पूरे देश के लिए एक ही आधिकारिक समय तय करना है। उन्होंने समझाया, “‘वन नेशन, वन टाइम’ का मतलब है पूरा देश एक ही समय को आधार माने। अभी अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग जगहों से समय लेती हैं। यह ऐसा ही है जैसे हर कोई अपनी दौड़ की शुरुआत अलग-अलग जगह से करे, जिससे सही समय का मिलान करना असंभव हो जाता है।”
भारत में IST पहले से है, तो नए नियमों से क्या बदलेगा?
सवाल है कि जब देश में पहले से IST है, तो नए नियम की जरूरत क्यों है। इसके जवाब में डॉ. अरोड़ा ने कहा, “IST दशकों से है और NPL इसको वैज्ञानिक तरीके से बनाए रखता है। NPL के पास एक रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क (IST®) भी है। इसमें वैज्ञानिकों और पूरी टीम का सालों का योगदान रहा है। लेकिन दिक्कत यह थी कि समय का कोई ‘कानूनी दर्जा’ नहीं था। कानूनन आप किसी को यह नहीं कह सकते थे कि वह अपना समय IST से ही मिलाए।”
वैज्ञानिक ने बताया कि NPL केवल समय के मानक तय करता है, जबकि इसे लागू कराने का काम लीगल मेट्रोलॉजी (नाप-तौल) विभाग का है। यह विभाग जैसे पेट्रोल पंप या दुकानों पर बाट और माप की जांच करता है, वैसे ही अब समय की भी जांच कर सकेगा।
इसका असली मकसद यह है कि देश में सब जगह एक ही कानूनी समय दिखे। इससे साइबर अपराध रुकेंगे, जांच आसान होगी और बिजली या बैंक जैसी जरूरी सेवाएं अधिक सुरक्षित होंगी।
समय का IST से ‘जुड़ा होना’ (ट्रेसेबल) क्या होता है, और यह कैसे होता है?
जैसे आपके कंप्यूटर पर दिखने वाला समय कहीं न कहीं से आता है। कंप्यूटर सेटिंग में ‘नेटवर्क टाइम सर्वर’ का विकल्प होता है। आमतौर पर यह विदेशी सर्वर पर तय होता है, यानी वह सीधा भारतीय समय नहीं दे रहा होता।
अभी लोग अलग-अलग जगहों, ज्यादातर अमेरिकी GPS से समय लेते हैं। मोबाइल कंपनियां अपने सर्वर से समय देती हैं, जिसमें सेकंडों या मिनटों का अंतर हो सकता है।
आप गाड़ी चलाते समय सुनें, तो एक एफएम रेडियो स्टेशन कहेगा कि 7 बजे हैं और दूसरा कहेगा 7 बजकर 1 मिनट हुआ है। यही समस्या है। अब NPL की एक वेबसाइट और सर्विस है। अगर आपका कंप्यूटर उससे जुड़ जाएगा, तो माना जाएगा कि आपका समय सही मायने में IST से जुड़ा है।
इंटरनेट के जरिए समय मिलाना (NTP) सबसे आसान तरीका है। इसके अलावा, जहां बहुत सटीक समय चाहिए, वहां खास केबल (पीटीपी), सैटेलाइट या NavIC का इस्तेमाल होता है।
किस काम के लिए कितनी सटीकता चाहिए, और ये तरीके एक-दूसरे से कैसे अलग हैं?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि काम क्या है। इसरो (ISRO) को सेकंड के अरबवें हिस्से (नैनोसेकंड) की सटीकता चाहिए होती है। सामान्य कामों के लिए इंटरनेट वाला NTP तरीका काफी है, जो सेकंड के हजारवें हिस्से (मिलीसेकंड) तक सही समय देता है। थोड़ा ज्यादा सटीक काम के लिए दफ्तरों के अंदर LAN नेटवर्क पर PTP का इस्तेमाल होता है, जो सेकंड के दस लाखवें हिस्से (माइक्रोसेकंड) की सटीकता देता है।
कोई भी घड़ी समय से थोड़ा-बहुत आगे-पीछे भटकने लगती है। इसीलिए यह सिस्टम थोड़ी-थोड़ी देर में खुद ही NPL के सर्वर से जांच करके अपनी घड़ी ठीक करता रहता है।
बहुत ही जरूरी कामों के लिए उपग्रहों (सैटेलाइट) और ऑप्टिकल फाइबर केबल से समय भेजा जाता है, जो सेकंड के खरबवें हिस्से (पिकोसेकंड) तक सटीक होता है।
आम लोगों को इसरो जैसी प्रणाली की बिल्कुल जरूरत नहीं है। सेना और अंतरिक्ष के लिए बहुत ज्यादा सटीकता चाहिए, जबकि बैंकों और शेयर बाजार का काम मिलीसेकंड वाली इंटरनेट सर्विस (NTP) से आसानी से चल जाता है।
कंपनियों को नियम मानने के लिए क्या करना होगा? क्या किसी को छूट मिलेगी?
हर कंपनी या संस्था को यह दिखाना होगा कि उसके कंप्यूटर या सिस्टम का समय IST से जुड़ा है। सिस्टम की सेटिंग से ही पता चल जाता है कि समय कहां से आ रहा है—NPL, NIC या हमारी प्रयोगशालाओं से।
फिलहाल किसी को भी छूट नहीं दी गई है। अगर होटल या इसरो के रॉकेट लॉन्च सेंटर जैसी जगहों पर स्थानीय जरूरत के अनुसार विदेशी समय दिखाना जरूरी हो, तो वे ऐसा कर सकते हैं। हालांकि, मुख्य समय IST (भारतीय मानक समय) ही प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा।
यह सिर्फ दीवार पर घड़ी टांगने की बात नहीं है। मकसद यह है कि पूरे देश में हर जगह ‘सेकंड की शुरुआत’ बिल्कुल एक ही पल में हो।
इसे जांचने की जिम्मेदारी लीगल मेट्रोलॉजी विभाग की होगी। NPL इसमें उनकी मदद करेगा और धीरे-धीरे इसकी जांच के तरीके लागू किए जाएंगे।
आम जनता पर इसका क्या असर पड़ेगा? क्या हमें फोन या लैपटॉप में कुछ बदलना होगा?
अगर आपका कोई बिजनेस नहीं है, तो आपको तुरंत कुछ करने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर कभी कोई साइबर क्राइम या बैंक फ्रॉड होता है, तो जांच में सही समय की बहुत बड़ी भूमिका होती है।
आम लोगों के लिए यह काम कंपनियां खुद करेंगी। आपकी टेलीकॉम और इंटरनेट कंपनियां नियम मानेंगी, तो आपके फोन या लैपटॉप पर अपने आप सही IST समय आने लगेगा।
वैसे अगर आप चाहें, तो अपने कंप्यूटर की सेटिंग में जाकर खुद भी NPL का टाइम सर्वर चुन सकते हैं। इसकी जानकारी NPL की वेबसाइट पर है।
भारत विदेशी सैटेलाइट (GPS) पर निर्भरता क्यों कम करना चाहता है?
अभी ज्यादातर लोग समय के लिए अमेरिका के GPS का इस्तेमाल करते हैं। अमेरिका जब चाहे इसकी सटीकता घटा सकता है या सेवा बंद कर सकता है। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को GPS का डेटा देने से मना कर दिया था। उसी के बाद भारत ने फैसला किया कि हमारा अपना सैटेलाइट सिस्टम होना चाहिए।
इसीलिए इसरो ने ‘NavIC’ बनाया, जो भारत और आसपास के इलाके में लोकेशन और रास्ता बताता है। इसे इसलिए बनाया गया ताकि अमेरिका अगर GPS बंद भी कर दे, तो हमारा काम न रुके।
नेविगेशन के लिए समय सबसे जरूरी चीज है। NavIC सैटेलाइट्स में अपनी परमाणु घड़ियां (एटॉमिक क्लॉक) लगी हैं, जो NPL से जुड़ी हैं। यानी NavIC का इस्तेमाल करना भी सीधे IST से जुड़ने का ही एक तरीका है।
NPL ने अब देश में ही अति-सटीक घड़ियां बनानी शुरू कर दी हैं। इससे भारत समय के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा और कल को अगर विदेश से संपर्क कट भी जाए, तो भी देश की बैंकिंग, बिजली और नेटवर्क सेवाएं बिना रुके चलती रहेंगी।

