साहित्याचार्य डा.शर्मा का पशुपक्षियों और पर्यावरण से प्रेम देता है समूचे समाज को प्रेरणा, जानिए शिक्षाविद डॉ शर्मा के सफलतम 42 वर्ष के सफर को

साहित्याचार्य डा.शर्मा का पशुपक्षियों और पर्यावरण से प्रेम देता है समूचे समाज को प्रेरणा, जानिए शिक्षाविद डॉ शर्मा के सफलतम 42 वर्ष के सफर को


भिलाई नगर 23 दिसंबर । सृजनशीलता , बागवानी , क्रियाशीलता, गीत-संगीत और लेखन आदि के कारण साहित्याचार्य एवं शिक्षाविद् डा.महेशचन्द्र शर्मा सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवा में पूर्णतः संलग्न हैं। वे उच्चशिक्षा की 42 वर्ष की सेवा से भले ही रिटायर हो गये हैं , किन्तु साहित्य,समाज , प्रकृति , पर्यावरण और पशुपक्षियों की सेवा में आज और भी अधिक संलग्न हैं। प्राध्यापक और प्राचार्य रहते हुए भी उन्होंने कालेजों ” पर्यावरण अध्ययन ” की कक्षायें लीं।

जलपुरुष के रूप में प्रसिद्ध मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित डा.राजेन्द्र सिंह के साथ एक पर्यावरण कार्यक्रम में आचार्य डा.महेशचन्द्र शर्मा

लगभग तीस वर्ष का इस अनिवार्य विषय के पठन-पाठन और लेखन-प्रकाशन का उनका अनुभव है। इस पर उनके धारावाहिक लेख भी पत्र-पत्रिकाओं में छपे और लोकप्रिय हुये । इटली के विश्व संस्कृत सम्मेलन में शोधालेख पढ़ा और प्रसिद्ध पायी। वे विद्यार्थियों को प्रोजेक्ट फाइल मेटेरियल भी देते। आज भी इस कार्य हेतु अनेक महाविद्यालयों में उन्हें ससम्मान आमंत्रित किया जाता है। हाल ही में अखिल भारतीय स्तर पर जयपुर से इस विषय पर प्रकाशित शोधनिबन्ध ग्रन्थ में पहला बीसपृष्ठीय शोधनिबन्ध उन्हीं का है। विशेष बात यह है कि साहित्याचार्य डा.शर्मा का यह प्रकृति पशु-पक्षी या पर्यावरण प्रेम केवल भाषण, लेखन या उपदेशों में ही नहीं , अपितु व्यवहार में भी है। और सेवानिवृत्ति पूर्व करोना काल से जारी है। घर के दरबाजे पर प्रतिदिन प्रातःकालीन दाना-पानी की व्यवस्था विगत तीन-चार साल , कोविड काल से आज तक जारी है। पक्षी-आवास , घोंसला भी है। छत पर और बाहर नानाप्रकार के पेड़-पौधे हैं। सपरिवार नियमित उनकी देखभाल और लालन-पालन किया जाता है ।

फूलों-फलों और औषधियों के अलावा हरा-भर और शुद्ध स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण मिलता है। आचार्य डा.शर्मा के अनुसार इसी की बदौलत अर्थरायिटिस, ब्रेनस्टोक, करोना- कोविड और पैरालिसिस से काफी राहत मिली ,और मिलेगी। कृषिप्रधान भारतीयता से ऋषिप्रधान भारतीयता अभिन्न है, दौनों एक दूसरे की सहायक और प्रेरक हैं।कल्चर एग्रीकल्चर से जुड़ी है। दौनों घुटन और अवसाद से बचाकर सृजनशीलता से जोड़ती हैं। आचार्य डा.शर्मा को भी इसका लाभ मिला। कुल दस पुस्तकों में से तीन का लेखन-प्रकाशन करोना काल में हुआ।देश-प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों से वे आनलाइन-आफलाइन जुड़े हैं। विद्यार्थियों के लिये प्लेसमेंट सेल , उड़ान आदि रोज़गारोन्मुख कार्यक्रम और फाइल तैयार करते हैं। अनेक कालेजों से उन्हें इस हेतु आज भी बुलाया जाता है। पहले से ही राज्य अलंकरण आदि से सम्मानित डा. शर्मा को छत्तीसगढ़ी स्वाभिमान संस्थान, रायपुर एवं दाऊ उदयप्रसाद ‘उदय’ साहित्यशोध संस्थान , दुर्ग आदि ने उनके भिलाई स्थित आवास में आकर उन्हें सम्मानित किया। इस प्रकार देश-प्रदेश की उच्चशिक्षा, साहित्य,संस्कृति, पर्यावरण और रोज़गारोन्मुख मार्गदर्शन में व्यस्त आचार्य डा.शर्मा ने थाईलैण्ड और कुबैत से प्राप्त आमन्त्रण प्रवास प्रस्तावों के प्रति भी असर्मथता व्यक्त कर दीं है। पर्यावरण के सन्दर्भ में विश्व जलपुरुष और रेमन मैगसेसे अवार्डी डा. राजेन्द्र सिंह का सान्निध्य लाभ डा.शर्मा को मिला है।