ट्रेनिंग कैंप छोड़ने वाले पुलिसकर्मियों की बर्खास्तगी बरकरार रखी हाईकोर्ट ने

ट्रेनिंग कैंप छोड़ने वाले पुलिसकर्मियों की बर्खास्तगी बरकरार रखी हाईकोर्ट ने


🔴कठिन ड्यूटी के डर से बिना अनुमति गायब होना अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि पलायन

बिलासपुर, 26 अगस्त। पुलिस और अन्य वर्दीधारी अनुशासित बलों में बिना अनुमति ड्यूटी या प्रशिक्षण छोड़कर लंबे समय तक अनुपस्थित रहना भारी पड़ सकता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसी स्थिति को हल्के में नहीं लिया जा सकता और कठिन परिस्थितियों के डर से ट्रेनिंग कैंप छोड़ना डेजर्शन यानी सेवा से पलायन माना जा सकता है।

जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की एकल पीठ ने तीन आरक्षकों की याचिकाएं खारिज करते हुए उनकी सेवा से बर्खास्तगी के आदेश को उचित ठहराया है। तीन आरक्षकों त्रिलोक चंद साहू, तीरथ दास बर्मन और लक्ष्मीनारायण पटेल की नियुक्ति वर्ष 2008-09 में पुलिस विभाग में हुई थी।

17 जून 2009 को तीनों को महाराष्ट्र के चाकुर स्थित बीएसएफ स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर में बुनियादी प्रशिक्षण के लिए भेजा गया था। हालांकि, उन्होंने बिना अनुमति प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ दिया

विभाग ने 8 फरवरी 2010 को उन्हें नोटिस जारी किया। जवाब के बाद 10 मार्च 2010 को तीनों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। विभागीय अपील और दया याचिकाएं भी खारिज होने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया था।

कोर्ट ने रिकॉर्ड और संबंधित नियमों की समीक्षा करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की सेवा अवधि तीन वर्ष पूरी नहीं हुई थी, इसलिए वे स्थायी कर्मचारी नहीं थे। वर्दीधारी बलों में तैनात कर्मचारी सामान्य या मामूली कारणों से लंबे समय तक अनुपस्थित नहीं रह सकते।

कोर्ट ने कहा कि कठिन क्षेत्र में ड्यूटी या असुविधाजनक स्थान पर प्रतिनियुक्ति की आशंका के कारण कैंप छोड़ देना डेजर्शन की श्रेणी में आता है। अनुशासित बलों में इस तरह के आचरण को किसी भी परिस्थिति में सामान्य नहीं माना जा सकता।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उन्हें स्वीकृत पदों पर नियुक्त किया गया था और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से वे अनुपस्थित हुए थे।

उनके अनुसार चिकित्सा दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए थे और विभागीय जांच के बिना बर्खास्तगी गलत थी।

राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि तीनों अस्थायी कर्मचारी थे। नियम 12 के तहत अस्थायी सरकारी कर्मचारी को एक महीने का नोटिस देकर सेवा से हटाया जा सकता है। ऐसे मामलों में विभागीय जांच अनिवार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने राज्य के पक्ष को स्वीकार करते हुए याचिकाएं खारिज कर दीं।