सीजी न्यूज़ ऑनलाइन, 06 जनवरी 2026। रायपुर निवासी स्वर्गीय प्रदीप चंद कर अपने पीछे कोई पुत्र नहीं, बल्कि तीन पुत्रियां—प्रेरणा कर, रागनी कर और नम्रता कर—को छोड़ गए हैं। तीनों पुत्रियां विवाहिता हैं, लेकिन उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि कर्तव्य, संस्कार और जिम्मेदारी में बेटियां किसी भी रूप में बेटों से कम नहीं होतीं।
स्वर्गीय प्रदीप चंद कर धार्मिक यात्रा पर शिर्डी गए हुए थे, जहां अचानक हृदयगति रुक जाने से उनका निधन हो गया। जीवन भर वे अपनी तीनों बेटियों को पुत्र के समान मानते रहे। वे अक्सर कहा करते थे कि “जब मैं इस दुनिया से जाऊं, तो मेरी मुखाग्नि मेरी बेटियां ही दें।”

पिता की इसी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए ज्येष्ठ पुत्री प्रेरणा कर ने अपनी दोनों बहनों के साथ मिलकर अपने पिता का अंतिम संस्कार कर मुखाग्नि दी। इस भावुक क्षण में बेटियों ने न केवल एक बेटी का, बल्कि बेटे का भी दायित्व निभाया और समाज को एक सशक्त संदेश दिया।

इसके पश्चात, स्वर्गीय प्रदीप चंद कर की अस्थियों का विसर्जन पवित्र त्रिवेणी संगम, प्रयागराज में विधि-विधान से किया गया। इस दौरान परिवार के वरिष्ठजनों का भी भावनात्मक सहयोग रहा। उनके पिता रत्नाकर कर एवं प्रसिद्ध भाषाविद डॉ. चितरंजन कर ने अपने पुत्र की अंतिम इच्छा की पूर्ति में अपनी पोतियों का साथ दिया।
यह घटना केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा बन गई है। इस कार्य ने बेटे-बेटियों के बीच व्याप्त असमानता की सोच को चुनौती दी है और यह संदेश दिया है कि यदि परिवार और समाज बेटियों को समान अधिकार और सम्मान दे, तो वे हर जिम्मेदारी पूरी कर सकती हैं।
तीनों बेटियों ने समाज की समस्त बेटियों की ओर से यह सशक्त संदेश दिया है कि
“बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं हैं।”

