बैंक ऑफ बड़ौदा ऋण घोटाला : मुख्य आरोपी 14 दिन की पुलिस रिमांड के बाद न्यायिक हिरासत में

बैंक ऑफ बड़ौदा ऋण घोटाला : मुख्य आरोपी 14 दिन की पुलिस रिमांड के बाद न्यायिक हिरासत में


सीजी न्यूज ऑनलाइन 3 जुलाई 2026। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (EOW-ACB) ने बैंक ऑफ बड़ौदा के बहुचर्चित ऋण घोटाले के मुख्य आरोपी विश्वजीत भौमिक को 14 दिन की पुलिस रिमांड में पूछताछ के बाद न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया है। आरोपी से पूछताछ के दौरान करोड़ों रुपये के बैंक घोटाले से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं।

ईओडब्ल्यू-एसीबी के अनुसार अपराध क्रमांक 04/2020 में आरोपी विश्वजीत भौमिक (56 वर्ष), निवासी बिलासपुर को 18 जून 2026 को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद विशेष न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), बिलासपुर ने 14 दिन की पुलिस रिमांड मंजूर की थी। रिमांड अवधि समाप्त होने पर 2 जुलाई 2026 को आरोपी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471, 120-बी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 12 एवं 13(2) के तहत मामला दर्ज है।

फर्जी फर्म बनाकर 5.04 करोड़ का ऋण कराया स्वीकृत

जांच में सामने आया कि 20 मार्च 2018 से 31 मई 2019 के बीच बैंक ऑफ बड़ौदा की राजकिशोर नगर शाखा, बिलासपुर में ओवरड्राफ्ट, टर्म लोन, बैंक गारंटी और कैश क्रेडिट लिमिट के नाम पर स्वीकृत ऋणों में गंभीर अनियमितताएं की गईं।

ईओडब्ल्यू के अनुसार विश्वजीत भौमिक ने बैंक अधिकारियों की कथित मिलीभगत से अपने और अपनी पत्नी के नाम पर कई शेल कंपनियां बनाई। इन फर्जी फर्मों के जरिए कूटरचित दस्तावेज प्रस्तुत कर करीब 5.04 करोड़ रुपये का ऋण स्वीकृत कराया और राशि का दुरुपयोग किया।

लोगों के दस्तावेजों का किया दुरुपयोग

जांच में पता चला कि आरोपी फाइनेंशियल कंसल्टेंसी और बैंक ऋण दिलाने के नाम पर लोगों का विश्वास जीतकर उनके आधार कार्ड, पैन कार्ड, जीएसटी दस्तावेज और संपत्ति के मूल कागजात अपने पास रख लेता था। बाद में इन्हीं दस्तावेजों का इस्तेमाल अन्य फर्जी फर्मों के ऋण में गारंटर और बंधक के रूप में किया जाता था।

आरोप है कि एक व्यक्ति की संपत्ति को दूसरी फर्म के ऋण के लिए गिरवी दिखाकर ऋण राशि वास्तविक लाभार्थियों को देने के बजाय आरोपी की फर्मों के खातों में ट्रांसफर कर दी जाती थी।

ब्लैंक चेक पर पहले ही करवा लेता था हस्ताक्षर

विवेचना में यह भी सामने आया कि आरोपी ऋण लेने वालों से पहले ही ब्लैंक चेकबुक पर हस्ताक्षर करवा लेता था और उनकी जानकारी के बिना खातों का पूरा संचालन स्वयं करता था। बैंक को संदेह न हो, इसके लिए खातों में इतनी राशि छोड़ी जाती थी कि ब्याज और किश्तों का भुगतान नियमित होता रहे।

मौके पर नहीं मिली कोई वास्तविक व्यावसायिक इकाई

ईओडब्ल्यू-एसीबी की जांच में जिन फर्मों के नाम पर ऋण लिया गया था, उनके पते पर कोई वास्तविक व्यवसाय संचालित नहीं मिला। जांच एजेंसी का दावा है कि ऋण स्वीकृत कराने के बदले संबंधित बैंक अधिकारियों को भी अनुचित लाभ पहुंचाया गया।

ईओडब्ल्यू-एसीबी के अनुसार आरोपी ने बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर कूटरचित दस्तावेजों के जरिए बैंक को करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान पहुंचाया। मामले में आगे की विवेचना जारी है।