भिलाई नगर 12 जून । हिंदुस्तान स्टील एम्प्लॉइज़ यूनियन, भिलाई (सीटू) द्वारा आयोजित ‘चारों श्रम संहिताओं का कर्मियों पर प्रभाव’ एवं 9 जुलाई 2025 की हड़ताल के महत्व पर बोलते हुए सीटू के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड तपन सेन ने कहा कि कॉरपोरेट घरानों की सामूहिक तानाशाही थोपने का माध्यम है श्रम संहिताएं। अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा अन्य 25 कानूनों के साथ 2021 की मानसून सत्र में आनन फानन में 2 दिनों में पारित करवाए गए 3 श्रम संहिताएं एवं 2020 की शीत सत्र में पारित करवाया गया वेतन संहिता वास्तव में उद्योगों में कॉर्पोरेट घरानों की सामूहिक तानाशाही थोपने की एक प्रक्रिया है। यह इस बात से भी प्रमाणित होता है क्योंकि भाजपाई राज्यों के साथ गैर भाजपाई राज्यों जैसे कर्नाटक , तमिलनाडु, तेलंगाना आंध्र प्रदेश की सरकारों ने उक्त श्रम संहिताओं के श्रमिक विरोधी प्रावधानों को नोटिफाई करना शुरू कर दिया है।
राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना जारी करने के बावजूद कर्मियों के दबाव में नियोक्ता काम के घंटे नहीं बढ़ाने पर सहमत
सीटू नेता ने कहा कि कर्नाटक राज्य सरकार द्वारा 12 घंटे का कार्य दिवस एवं महिलाओं को रात्रि पाली में कार्य करने की नियोक्ताओं को अनुमति देने से संबंधित अधिसूचना जारी करने के पश्चात 1200 उद्योगों के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी जिसके परिणाम स्वरूप वहां के उद्योगपतियों ने लिखित में कर्मियों के यूनियनों के साथ यह समझौता किया कि भले ही सरकार ने नोटिफाई कर दिया है किंतु हम इसे लागू नहीं करेंगे। इसी तरह तमिलनाडु सरकार द्वारा स्थाई आदेश में संशोधन कर स्थाई कर्मियों के स्थान पर अप्रेंटिस की नियुक्ति करने के प्रावधान की अधिसूचना जारी कर दिया है। आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना की राज्य सरकारों ने भी 12 घंटे का कार्य दिवस से संबंधित अधिसूचना जारी कर दी है जिससे खिलाफ वहां के कर्मी संघर्ष कर रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में किसी भी समय नोटिफाई हो सकता है श्रम संहिताएं
इस अवसर पर सीटू के छत्तीसगढ़ राज्य कार्यकारी अध्यक्ष एसपी डे ने जानकारी दी कि 25 जून 2021 को छत्तीसगढ़ में तत्कालीन कांग्रेस की राज्य सरकार द्वारा चारों श्रम संहिताओं से संबंधित नियम प्री पब्लिश कर दिया गया है तथा वर्तमान राज्य सरकार द्वारा किसी भी समय इसे अधिसूचित किया जा सकता है।
राष्ट्रीय संपदा पर कब्जा करने की तानाशाही प्रक्रिया है आर्थिक नीतियां
सीटू नेता ने कहा कि कॉमर्शियल माईनिंग सफल नहीं होने के कारण अब सरकार एमडीओ मॉडल के तहत राष्ट्रीय हितों को ताक पर रख कर कॉर्पोरेट घरानों को प्राकृतिक संसाधनों पर अपना कब्जा करने की छूट दे रही है। कॉमर्शियल माईनिंग इसलिए सफल नहीं हो पाया क्योंकि उसमें निजी कंपनियों को खनिज संपदा युक्त ग्रीनफील्ड का खनन करने एवं उन खनिजों को खुले बाजार में बेच कर मुनाफा कमाने का प्रावधान था किंतु ऐसा करने के लिए आवश्यक भारी निवेश में निजी कंपनियों ने रुचि नहीं दिखाई इसलिए एमडीओ मॉडल में सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा तैयार किया हुआ माइंस को मुफ्त में देकर अकूत मुनाफा कमाने की छूट देने का प्रावधान लाया गया है।
नक्सली उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों का हो रहा है दमन
सीटू नेता ने यह भी कहा कि नक्सली उन्मूलन के नाम पर, जिस तरह से हाल ही में अति न्यायिक तरीका अपनाया गया वह अत्यंत निंदनीय है। नक्सली ऑपरेशन में मारे गए कथित नक्सलियों तथा आदिवासियों के शव को परिजनों को नहीं सौंपना किसी भी सभ्य समाज में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता है। नक्सली उन्मूलन के नाम पर सरकार की योजना ‘वन अधिकार कानून’ के तहत आदिवासियों को प्राप्त अधिकार से उन्हें वंचित रखना तथा वन से बेदखल करना है।

