श्री श्री रविशंकर बोले : महाकुंभ अंतर्मन की चेतना का अनंत प्रवाह

श्री श्री रविशंकर बोले : महाकुंभ अंतर्मन की चेतना का अनंत प्रवाह



🛑 यहां बहती है ज्ञान-भक्ति-कर्म की त्रिवेणी

सीजी न्यूज ऑनलाइन 05 फरवरी । मानवता की अमूर्त धरोहर के रूप में जग विख्यात संगम तट के महाकुंभ मेले में देश ही नहीं, एशिया से यूरोप तक के साधु-संन्यासी ज्ञान-भक्ति-वैराग्य की त्रिवेणी में साधना की चादरें रंगा रहे हैं। मौनी अमावस्या हादसे के बाद अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक धर्मगुरु श्री श्री रविशंकर महाराज भी महाकुंभ में जीवन जीने की कला की सीख विश्व समुदाय को देने पहुंचे हैं। महाकुंभ की संस्कृति और इसकी वैश्विक महिमा कितनी व्यापक है। संगम की ताकत और इस तट पर ज्ञान की गहरी जड़ों से जुड़ने के लिए विश्व भर की आतुरता को समझने के लिए इस आयोजन से जुड़े विविध पक्षों पर अमर उजाला ने उनसे विस्तार से बात की। प्रस्तुत है श्री श्री रविशंकर से बातचीत के अंश…।

प्रश्न: संगम तट पर पूरी दुनिया की विविधता सनातन की भक्ति के रंग में रंग गई है। महाकुंभ क्या वास्तव में एकता का महायज्ञ है?
उत्तर: देखिए, राजा-महाराजाओं का दौर हो या फिर सैकड़ों वर्षों की गुलामी का कालखंड, आस्था का यह प्रवाह कभी नहीं रुका। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि कुंभ का कारक कोई वाह्य शक्ति नहीं है। किसी बाहरी व्यवस्था के बजाए कुंभ मनुष्य के अंतर्मन की चेतना का नाम है। यह चेतना स्वत: जागृत होती है। यही चेतना भारत के कोने-कोने से लोगों को संगम के तट तक खींच लाती है। गांव, कस्बों, शहरों से लोग तीर्थराज की ओर निकल पड़े हैं। सामूहिकता की ऐसी शक्ति, ऐसा समागम शायद ही कहीं और देखने को मिले।
यहां आकर संत-महंत, ऋषि-मुनि, ज्ञानी-विद्वान, सामान्य जन सब एक हो जाते हैं। सब एक साथ त्रिवेणी में डुबकी लगा रहे हैं। यहां जातियों का भेद खत्म हो जाता है, संप्रदायों का टकराव मिट जाता है। करोड़ों लोग एक ध्येय, एक विचार से जुड़ जाते हैं। इस बार भी महाकुंभ के दौरान यहां अलग-अलग राज्यों से करोड़ों लोग जुटे हैं। उनकी भाषा अलग है, जातियां अलग हैं, मान्यताएं अलग हैं, लेकिन संगमनगरी में आकर वह सब एक हो गए हैं। इसीलिए महाकुंभ एकता का महायज्ञ है।
प्रश्न: महाकुंभ की संस्कृति को आप किस रूप में व्यक्त करेंगे?

उत्तर: महाकुंभ दुनिया भर के विपरीत विचारों, मत-मतांतरों, नर-किन्नरों, सारे संप्रदायों के समागम का मेला है। इस मेले में सब अपने-अपने तरीके से भगवान का भजन, कीर्तन और पूजन कर रहे हैं। कोई किसी को रोकटोक नहीं रहा है। न ही कोई किसी पर दबाव बना रहा है। पूरे विश्व के लिए यह महाकुंभ मानवता व प्रेम का एक संदेश है। पूरे भारत के लोग यहां अनेकता में एकता का संदेश दे रहे हैं। यही महाकुंभ है।

प्रश्न: आप हमेशा आपस में प्रेम करने, एक होकर रहने, शांति-भाईचारा प्रगट करने की सीख देते रहे हैं। दुनिया युद्ध की आग में झुलस रही है। इस महाकुंभ से आप युद्धरत देशों के लिए कोई संदेश देंगे?

उत्तर: विश्व के कई देश धर्म-सरहद और वर को लेकर आपस में लड़ रहे हैं। ऐसे देश एक-दूसरे को खत्म करने पर आमादा हैं। ऐसे लोगों को महाकुंभ से सीख लेनी चाहिए। यह प्रेम और एकता का मेला है। यहां विपरीत विचारों के ही लोग मिलते हैं।

प्रश्न: संगम की ताकत के बारे में क्या कहेंगे?

उत्तर: प्रयागराज में सिर्फ तीन नदियों का ही संगम नहीं है, बल्कि यहां पर साधना, सेवा और सत्संग का भी संगम है। इतने सारे संप्रदाय एक जगह अपने हिसाब से सत्संग कर रहे हैं। कोई किसी पर पत्थर नहीं फेंक रहा है। यहां सहिष्णुता का संगम है। यहां हम सभी संप्रदायों का आदर कर रहे हैं।

प्रश्न: मौनी अमावस्या हादसे के बाद भी भीड़ कम नहीं हुई। संगम की अमृतमयी बूंदों से स्पर्श की आतुरता के बारे में क्या ख्याल है?

उत्तर: इतनी परेशानी के बावजूद हम डटे हैं। हमारी आस्था इतनी बड़ी घटना के बाद भी अडिग है। हम ज्ञान, भक्ति और कर्म के संगम तट पर खड़े हैं। यहां गंगा, यमुना, सरस्वती का अद्भुत मिलन है। गंगा ज्ञान की, यमुना भक्ति की और सरस्वती कर्म की प्रतीक हैं। इस ज्ञान-भक्ति और कर्म की त्रिवेणी में भला कौन डुबकी नहीं लगाना चाहेगा।

प्रश्न: इस हादसे के लिए किसको जिम्मेदार ठहराएंगे?

उत्तर: मौनी अमावस्या हादसे की जांच की जा रही है। जांच के बाद पता चलेगा कि कौन जिम्मेदार है। पूरी देश की जनता इस आपदा की घड़ी में एक साथ है। पीड़ितों का दर्द पूरे देश का दर्द है। हम प्रार्थना करेंगे कि पीड़ितों, प्रभावितों के मन को शांति मिले। बहुत बड़ा आघात लगा है। लोगों ने अपनों को खोया है। देश का हर व्यक्ति दुखी है। मैं इतना कहना चाहूंगा कि संगम में ही स्नान करें, जरूरी नहीं है। जहां गंगा या यमुनायमुना दिख रही हैं, वहीं स्नान करें। मेला क्षेत्र में स्नान करना ही पुण्य है।

प्रश्न: महाकुंभ में सनातन बोर्ड के गठन और वक्फ बोर्ड को भंग करने के मुद्दे पर आपकी राय क्या है?

उत्तर: मुझे धर्म संसद में बुलाया गया था, लेकिन मैं वहां जा नहीं सका। सनातन बोर्ड और वक्फ बोर्ड दोनों के बारे में क्या होना चाहिए, इस पर संतों में अभी तक क्या राय बनी है, मुझे पता नहीं है। धर्म संसद में गया नहीं, इसलिए इस पर अभी कुछ कहना उचित नहीं होगा।