सफलता और असफलता के बीच सिर्फ सोच का होता है फासला दो साल कोचिंग के बाद नहीं हुआ सलेक्शन तो कर दिया गिवअप, सेल्फ मोटिवेशन से तीसरी कोशिश में हुआ चयन पढ़िए निशिका की डॉक्टर बनने तक की सफलता की कहानी

सफलता और असफलता के बीच सिर्फ सोच का होता है फासला दो साल कोचिंग के बाद नहीं हुआ सलेक्शन तो कर दिया गिवअप, सेल्फ मोटिवेशन से तीसरी कोशिश में हुआ चयन पढ़िए निशिका की डॉक्टर बनने तक की सफलता की कहानी


सफलता और असफलता के बीच सिर्फ सोच का होता है फासला दो साल कोचिंग के बाद नहीं हुआ सलेक्शन तो कर दिया गिवअप, सेल्फ मोटिवेशन से तीसरी कोशिश में हुआ चयन पढ़िए निशिका की डॉक्टर बनने तक की सफलता की कहानी

भिलाई नगर 19 जून ।  सिंगल पैरेंट्स मां के लिए एक बेटी बचपन से मजबूत सहारा बनने का सपना देखती थी। उसे लगता था कि अगर मैं डॉक्टर बन जाऊंगी तो मां की जीवन पर्यंत अच्छे से देखभाल कर पाऊंगी। साथ ही समाज के उन लोगों का भी सहारा बनूंगी जिन्हें मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है। यही सोच लेकर कवर्धा निवासी डॉ. निशिका माटा का बचपन बीता। मन में धीरे-धीरे आकार ले रहे सपने को तराशने वो दृढ़ संकल्पित थी लेकिन मेहनत में शायद कहीं कोई कमी रह गई इसलिए लगातार दो साल उन्हें असफलता का सामना करना पड़ा। एक वक्त ऐसा भी आया जब होनहार स्टूडेंट दो साल ड्रॉप के बाद निराश हो गई और गिवअप करके तीसरे साल बीएमएस ज्वाइन कर लिया। कहते हैं कि असफलता और सफलता के बीच सिर्फ सोच का फासला होता है। एमबीबीएस स्टूडेंट्स को कॉलेज में देखकर उनसे रहा नहीं गया और तीसरे साल एक बार फिर पूरे मन से प्रयास किया। यह तीसरा प्रयास उनके हिस्से में मेडिकल कॉलेज का दाखिल लेकर आया। सीजी पीएमटी क्वालिफाई करके साल 2009 में निशिका आखिरकार मेडिकल कॉलेज पहुंच ही गई। एमबीबीएस के बाद देश के सबसे नामी मेडिकल कॉलेज से स्त्री रोग विशेषज्ञ की पढ़ाई करने वाली डॉ. निशिका कहती है कि मेहनत सभी स्टूडेंट करते हैं। लेकिन फर्क सिर्फ सोच का होता है। कोई दुनिया की बातें सुनकर जल्दी हार जाता है तो कोई आखिरी सांस तक लडऩे का मन बनाता है। 

आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी परिवार ने मदद करके पढ़ाया

डॉ. निशिका का पालन पोषण उनकी मां ने बेहद विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में किया। डॉ. निशिका ने बताया कि जब लगातार दो साल कोचिंग के बाद भी सफलता नहीं मिली तो मैं मन से हार गई थी। बार-बार यही सोचती कि परिवार और रिश्तेदारों ेने पैसे देकर मुझे पढ़ाया और मैं कुछ नहीं कर पाई। ये चीजें मन को अंदर तक कचोटती थी, तब मां ने कहा कि बेटा संघर्ष से ही सफलता मिलती है। उनकी बातें इतनी प्रेरणादायी थी कि मैं सबकुछ भूलकर एक और कोशिश की लिए जुट गई। मां ने हर परिस्थिति में मुस्कुराना सिखाया। देखा जाए तो मेरी सफलता का पूरा श्रेय मेरी मां को जाता है क्योंकि उनका मुझ पर भरोसा ही था जिसके कारण आज मैं डॉक्टर बन पाई। 

सचदेवा में पढ़कर जीतने का हौसला मिला

डॉ. निशिका ने बताया कि जब उन्होंने बोर्ड एग्जाम दिया तब उन्हें ये तक पता नहीं था कि मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए कौन-कौन सी परीक्षाएं देनी पड़ती है। आसपास माहौल भी ऐसा था जिसमें कोई गाइड करने वाला नहीं मिला। ऐसे में जब सचदेवा पहुंची तो यहां आकर ही मुझे जीतने का हौसला मिला। शुरूआत के एक साल चीजों को समझने में निकल गया। स्कूल की पढ़ाई और मेडिकल एंट्रेस की तैयारी में काफी अंतर होता है। विषयों को यहां सिर्फ नंबर लाने के लिए नहीं बल्कि समझने के लिए पढ़ती थी। सचदेवा के टीचर्स ने काफी सपोर्ट किया। पहले सवाल पूछने में झिझिक होती थी लेकिन फ्रेंडली माहौल में ये झिझक भी दूर हो गई। सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर की मोटिवेशनल बातें सुनकर कोई नेगेटिव हो ही नहीं सकता। उन्होंने निराशा के दौर में कई बार मेरी पर्सनल काउंसलिंग की थी। तीसरे ड्रॉप में भी जब टेस्ट सीरिज दिलाने जाती तो जैन सर का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर बहुत एनर्जी मिलती थी।

एग्जाम के पैटर्न को समझना है जरुरी

नीट की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स से कहना चाहती हूं कि सबसे पहले एग्जाम के पैटर्न को समझने की कोशिश करना चाहिए। ज्यादा पढऩे की बजाय सलेक्टिव स्टडी मटेरियल पर फोकस करें। जो पढ़ा है उसे उसी दिन रिविजन करने की आदत डालें। इससे आपको विषयों को याद रखने में काफी मदद मिलेगी। पढ़ाई में कभी भी दो से ज्यादा दिनों का गैप न दें। स्टडी का अपना रूटीन बनाएं उसी हिसाब से तैयारी करें। पढऩे के साथ-साथ अपने सेहत का भी ख्याल रखें।