गांव से पहली बार आया शहर, इंग्लिश मीडियम के बच्चों को देखकर होती थी झिझक, किसान पिता दूसरों से पैसा उधार लेकर थे भेजते , ठाना था डॉक्टर बनकर ही घर लौटूंगा और कर दिखाया पुष्पराज ने, पढ़ें एक और सफलता की कहानी

गांव से पहली बार आया शहर, इंग्लिश मीडियम के बच्चों को देखकर होती थी झिझक, किसान पिता दूसरों से पैसा उधार लेकर थे भेजते , ठाना था डॉक्टर बनकर ही घर लौटूंगा और कर दिखाया पुष्पराज ने, पढ़ें एक और सफलता की कहानी


गांव से पहली बार आया शहर, इंग्लिश मीडियम के बच्चों को देखकर होती थी झिझक, किसान पिता दूसरों से पैसा उधार लेकर थे भेजते , ठाना था डॉक्टर बनकर ही घर लौटूंगा और कर दिखाया पुष्पराज ने, पढ़ें एक और सफलता की कहानी

भिलाई नगर 26 जून । गांव में हॉस्पिटल सुविधा नहीं थी। इलाज के लिए दूर जिला मुख्यालय में जाना पड़ता था। डॉक्टर भी कभी-कभार ही दिखाई पड़ते थे। ऐसे में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला के छोटे से गांव बम्हनी निवासी डॉ. पुष्पराज सिंह पैकरा ने फैसला किया वे बड़े होकर डॉक्टर ही बनेंगे। किसान पिता को जब उन्होंने अपने सपने के बारे में बताया तो पिता भी राजी हो गए। आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने बेटे को कोचिंग के लिए शहर भेजने का फैसला किया। बेटा भी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरा। कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए साल 2015 में पुष्पराज ने सीजी पीएमटी क्वालिफाई कर लिया। उस दिन पिता ने पूरे गांव में मिठाई बांटी थी। डॉ. पुष्पराज कहते हैं कि गांव के किसी घर के बेटे का डॉक्टर बन जाना किसी चमत्कार से कम नहीं था। पहले साल मिली असफलता से सीख लेकर मैंने कड़ी मेहनत की और दूसरे ड्रॉप में अपना सलेक्शन पक्का कर लिया। मुझे याद है कोचिंग की फीस भरने के लिए पिता दूसरों से पैसा लेकर शहर मेरे पास भेजते थे। उनका प्रोत्साहन और भरोसा ही था जिसके कारण मैं आज इस मुकाम पर पहुंच पाया। 

शहर के बच्चों को देखकर होती थी झिझक

डॉ. पुष्पराज ने बताया कि वे पहली बार अपने गांव से बाहर आए थे। शहर में जब मैंने कदम रखा तो यहां के इंग्लिश मीडियम के बच्चों को देखकर बहुत झिझक होती थी। उनकी तैयारी मुझसे काफी अच्छी थी। फिर भी मैंने हार नहीं मानी अपनी झिझक को दूर करने के लिए पढऩे पर ध्यान केंद्रित किया। फिजिक्स हर बायो स्टूडेंट की तरह मेरा भी वीक था। पीजी रूम में सारे लोगों को तैयारी करते देख मोटिवेट होता था। उनकी तरह मैं भी अपनी तैयारी में जुट जाता था। पढ़ते वक्त दिमाग में हमेशा ये बात रहती थी कि मेरे पिता ने कितना संघर्ष करके कोचिंग की फीस भरी है। ऐसे में मैं डॉक्टर बनकर ही घर लौटना चाहता था। पहले ड्रॉप में तैयारी तो पूरी थी लेकिन रिविजन नहीं कर पाने के कारण पेपर ठीक से साल्व नहीं कर पाया। दूसरे साल मैंने रिविजन के लिए अलग से टाइम निकाला। मेन एग्जाम से पहले कम से कम तीन बार पूरे सिलेबस का रिविजन किया था। 

सचदेवा के टीचर्स नहीं हारने देते किसी बच्चे को 

सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज से मेडिकल एंट्रेस की कोचिंग करने वाले डॉ. पुष्पराज ने बताया कि यहां का माहौल काफी पॉजिटिव है। टीचर्स किसी भी स्टूडेंट को हारने नहीं देते। क्लास में कमजोर स्टूडेंट को भी लगातार मेहनत करने के लिए मोटिवेट करते हैं। जिससे स्टूडेंट्स का भी कॉन्फिडेंस बढ़ता है। रही सही कसर सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर पूरी कर देते हैं। वे अलग से बच्चों की काउंसलिंग और मोटिवेशनल क्लास लेते हैं। ताकि स्टूडेंट मैंटली फ्री होकर पढ़ाई कर सके। यहां का टेस्ट सीरिज बहुत अच्छा है। इसके साथ ही गेस्ट लेक्चर में आने वाले ओल्ड स्टूडेंट की जर्नी हर बार कुछ नया करने के लिए मोटिवेट करती है। उनका एक्सपीरियंस काम आता है। 

टेस्ट जरूर दिलाएं

नीट की तैयारी करने वाले स्टूडेंट से कहना चाहता हूं कि आप टेस्ट जरूर दिलाएं। कई बार हमारी तैयारी तो बहुत अच्छी रहती है लेकिन टेस्ट का डर दिमाग पर हावी रहता है। टेस्ट देने से डर लगता है। यही बाद में एग्जाम फोबिया बन जाता है। इसलिए डर पर काबू पाने के लिए टेस्ट दीजिए। टेस्ट कहीं न कहीं आपकी तैयारी को भी पुख्ता करती है।