2023 तक टीबी उन्मूलन में मीडिया की भूमिका विषय पर सुपेला में हुई कार्यशाला,
टीबी के लिए नीतिकारक पत्रकारिता के लिए रीच संस्था का आयोजन
भिलाई नगर, 4 अगस्त। टीबी जैसे स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर ज़िम्मेदार और नीतिकारक पत्रकारिता बेहद ज़रूरी है, ताकि पढ़ने वालों को सही जानकारी मिले। टीबी पर रिपोर्टिंग ज़िम्मेदार तरीके से करने से रूढ़िवादी सोच का अंत करने और लोगों तक सही और वास्तविक सन्देश पहुँचाने में मदद होती है। आज सेंट्रल पार्क होटल में आयोजित सेमिनार में टीबी रोग व निदान पर डॉ अनिल शुक्ला, डॉ शानू नायक ने 2023 तक टीबी उन्मूलन में मीडिया की भूमिका विषय पर विस्तृत जानकारी दी। रीच संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में अनेक पत्रकारों ने भी भाग लिया।
डाॅ. शुक्ला ने बताया कि टीबी के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए रोग के हर पहलु को प्रस्तुत करने की कोशिश करना चाहिए। टीबी एक जटिल बीमारी है। इस रोग के पहलुओं पर रिपोर्टिंग करते वक़्त केवल पॉजिटिव केसों के आंकड़ों पर या टीबी से जुड़ी मृत्युओं के साथ-साथ सामाजिक, चिकित्सकीय, निजी या विज्ञान सम्बंधित, आर्थिक, शैक्षिक, राजनैतिक और बाकी सभी पहलुओं पर छानबीन करने की कोशिश के साथ ही कुछ आशावादी केस स्टडीज़ या सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा किये गए प्रयासों पर भी प्रकाश डालना अच्छा होता है।
उन्होंने बताया कि दुर्भाग्यवश समाज में टीबी से जुड़ी कई भ्रांतियां और मिथ्याएँ हैं। कई लोग भेद-भाव के डर से इलाज नहीं कराते। जब आप किसी को उद्धृत करते हुए उनकी पहचान घोषित करते हैं तो आपको जागरूक रहना चाहिए कि इससे वह अपनी नौकरी या घर भी खो सकते हैं। बिना टीबी मरीज़ की अनुमति पत्रकारों को उनकी पहचान का खुलासा नहीं करना चाहिए। अपनी ख़बर या कहानियों में मीडिया के लोगों को उन टीबी मरीज़ों की गोपनीयता बनाये रखने का प्रयास करना चाहिए जिनसे उन्होंने बात की है। टीबी से पीड़ित 18 से कम उम्र के बच्चे किशोर न्याय (देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम 2015 (जो जेजे एक्ट के नाम से जाना जाता है), के तहत देखभाल और सुरक्षा के लिए वर्गीकृत माने जाते हैं। इस अधिनियम के तहत गोपनीयता बनाए रखना चाहिए।
रीच संस्था के फिडियस केरकेट्टा ने कहा कि टीबी जैसे जटिल रोग के बारे में पहले से ही कई गलतफहमियां समाज में हैं, इसे छूत की बीमारी या केवल गरीबों को होने वाली बीमारी माना जाता है। समाज में टीबी मरीज़ों का वर्णन ऐसे ही रूढ़िवादी सोच के अनुसार होता है तो इससे लोगों के मन में गलतफहमियाँ और बढ़ जाती हैं। रीच संस्था टीबी की ऐसी ही भ्रातियों को समाज से दूर कर पत्रकारों के लिए फेलोशिप प्रोग्राम भी आयोजित करता है जिसकी ट्रेनिंग भी दी जाती है।
श्री केरकेट्टा ने बताया कि 2023 तक छत्तीसगढ़ को टीबी मुक्त बनाने अभियान चलाया जा रहा है। एक टीबी मर4ज 10 से 15 लोगों तक संक्रमण फैलाता है इसलिए सही समय पर उसका उपचार जरूरी है। मीडिया कर्मियों को टीबी पर रिपोर्टिंग करते समय सरकार, औषधीय उद्योग, निजी चिकित्सक और गैर सरकारी संस्था या एनजीओ आदि स्रोतों से भले ही आंकड़े या जानकारी ली जा सकती है मगर हमेशा ध्यान रखें कि यह खबर पक्षपातपूर्ण न हो और जहाँ तक हो सके विभिन्न दृष्टिकोण को पेश कर सके। टीबी को लेकर जब सरकारी अधिकारी दावा करते हैं कि कोई कार्यक्रम अच्छी तरह काम कर रहा है तो इस संबंध में मरीज़ों से भी बात कर लेना चाहिए। इस कार्यक्रम को डाॅ. शानू नायक ने भी सम्बोधित किया।

