🔷 नाम तो सुना होगा – “IAS VARUN KUMAR BARANWAL”
“डाक्टर बनने की चाहत थी, रूपये थे नहीं इसलिए इंजीनियरिंग करते हुए UPSC के लिए घूम गया मन
सीजी न्यूज आनलाईन, 28 जनवरी। पिता की साइकिल मरम्मत की दुकान ही उनके परिवार की आय का एकमात्र स्रोत थी और अचानक पिता की मृत्यु के बाद दुकान की सारी जिम्मेदारी बेटे के नाज़ुक कंधों को सम्हालना पडा़। दुकान के साथ ही अपने परिवार के भरण पोषण और देखभाल की जवाबदारी उठाते हुए बचे थोडे़ समय का पढ़ाई में सदुपयोग करने वाला इसी बेटे ने 10वीं की परीक्षा में अपनी कक्षा में टॉप किया। इतना ही नहीं छोटी सी सायकल दुकान में पंचर घिसता और बनाता यही लड़का अब किसी भी परिचय का मोहताज इसलिए भी नहीं है कि अब पूरा देश उसे जानता है, जी हां नाम तो सुना ही होगा – “IAS VARUN KUMAR BARANWAL..!”
अगर हौसले बुलंद हों और मजबूत आत्मविश्वास हो तो हर इंसान अपने सपनों को पूरा कर लेता है। दुनिया की सारी तकलीफों को पीछे छोड़ते हुए सफलताओं के डगर में आगे बढ़ता रहता है। इसी बात को सच साबित किया है महाराष्ट्र के एक छोटे से शहर बोइसार के रहने वाले वरुण बरनवाल ने, जो पंक्चर की दुकान चलाकर अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने वाले से आईएएस अधिकारी बन गया है। वरुण ने एक समय अपनी स्कूल की पढ़ाई छोड़ साइकिल के पंचर बनाने का काम शुरू किया था। पिता की मौत के बाद पूरा परिवार भूख से परेशान था। ऐसे में बचपन से पढ़ाई में अव्वल रहे वरुण ने 10वीं कक्षा की परीक्षा देने के बाद से अपने परिवार का दायित्व संभाला और अपने पिता के साइकिल मरम्मत की दुकान को चलाने लगा। वह दिन रात अपनी किताबों से दूर साइकिल के पंचर बनाता जरूर था लेकिन उसका मन हमेशा पढ़ाई में ही रहा।

इस आईएएस के संघर्ष और सफलता के सफर पर लिए चलने से पहले हम बता दें कि वरुण बरनवाल महाराष्ट्र के पालघर जिले के छोटे से शहर बोईसर के एक आईएएस अधिकारी हैं, जो कभी हमेशा डॉक्टर बनने का सपना देखते थे। वरुण के पिता साइकिल मैकेनिक थे और साइकिल रिपेयरिंग की एक छोटी सी दुकान से परिवार का गुजारा होता था। पिता ने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए कड़ी मेहनत की। वरुण कुमार बरनवाल ने 2006 में अपने पिता को खो दिया। पिता की अचानक मृत्यु के बाद परिवार का आर्थिक बोझ वरूण के कच्चे कंधों पर आ गया क्योंकि वही अपने परिवार में सबसे बड़ा बेटा था।
हम सभी जानते हैं कि संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) भारत में सबसे कठिन परीक्षाओं और इंटरव्यू में से एक का आयोजन करता है। साल दर साल, लाखों उम्मीदवार सालों की कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा देते हैं, लेकिन आखिर में कुछ ही चुने जाते हैं। कड़ी मेहनत, मार्गदर्शन और दृढ़ता का उचित संयोजन ही UPSC के उम्मीदवारों को IAS परीक्षा में सफल होने में मदद कर सकता है। कड़ी मेहनत और समर्पण के साथ, ये कैंडिडेट्स उन लोगों की ओर देखते हैं जिन्होंने इन परीक्षाओं को पास किया था और सम्मानजनक पदों को प्राप्त किया था।
आपको बता दें कि वरुण ने कम उम्र में ही अपने पिता को खो दिया और पढ़ाई छोड़ने का फैसला किया लेकिन जीवन संघर्ष में लगातार आती कठिनाइयों से जूझते वरूण ने एक दिन आईएएस अफसर बनने का जो स्वप्न संजोया, उसे आस-पास के कुछ लोगों ने हासिल करने वरूण की काफी मदद भी की।उन्हें अपने IAS अफसर बनने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद की। वरुण की मां ने पढ़ने के प्रति उनकी लगन और जीवन में कुछ करने की चाह देखी तो उन्होंने दुकान की जिम्मेदारी संभाली और उन्हें आगे पढ़ाई जारी रखने को कहा।
वरुण बरनवाल का सबसे बड़ा सहारा बने डॉ. कामप्ली, जिन्होंने निधन से पहले वरूण के पिता का इलाज किया था। डॉ. कामप्ली ने न केवल वरूण के कॉलेज की शुरुआती फीस में बल्कि बाद में IAS की पढ़ाई में भी मदद की। क्योंकि स्कूली शिक्षा के बाद वरुण ने अपने जुनून का पालन करने का फैसला कर लिया था। पहले वरूण ने मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन मेडिकल की पढ़ाई की फीस बहुत ज्यादा थी इसलिए वह इसके बजाय इंजीनियरिंग की तैयारी करने लगा।
वरुण ने एमआईटी कॉलेज पुणे में एडमिशन लिया और कॉलेज से स्कॉलरशिप प्राप्त करने के लिए अपने इंजीनियरिंग कोर्सेज के पहले सेमेस्टर में कड़ी मेहनत की। स्कूल की स्कॉलरशिप का उपयोग करते हुए वह अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने में सक्षम बना। इस दौरान वरुण के दोस्तों ने भी उसकी मदद की और उन्हें किताबें लाकर देते हुए कठिन समय में साथ दिया।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वरूण को एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई। उनका परिवार चाहता था कि वे अपनी एमएनसी की नौकरी जारी रखें लेकिन वरुण सिविल सेवाओं के साथ आगे बढ़ना चाहते थे। परीक्षा की तैयारी के लिए उन्हें एनजीओ से मदद मिली जिन्होंने उन्हें किताबें मुहैया कराईं। सभी की मदद से वह परीक्षा पास करने में सफल रहे और आईएएस अधिकारी बन गए।
आपको बता दें कि गरीबी के जीवन को सबक के रूप में देखने वाले वरूण ने UPSC 2016 की परीक्षा में 32वीं रैंक हासिल की और IAS अधिकारी बने। वरुण के पास कई इंस्पिरेशन हैं और उन्हें लगता है कि सामूहिक अनुभव उन्हें एक बेहतर सिविल सेवक बनने में मदद करता है। पढ़ने के जुनून और जीवन में कुछ करने की चाह ने वरुण कुमार बरनवाल को उस सफलता तक पहुंचाया जिसकी आकांक्षा भारत के कई युवा करते हैं।

