भिलाई नगर 26 दिसंबर । तिल्दा-नेवरा के पास तुलसी गांव के रहने वाले डॉ. आलोक कुमार देवांगन बचपन से कुछ अलग करना चाहते थे। मीडिल क्लास फैमिली में पले बढ़े डॉ. आलोक की स्कूलिंग भी गांव से ही हुई। दसवीं बोर्ड में जब साइंस में अच्छा नंबर आया तो उन्होंने बायो लेकर आगे पढऩे की ठानी और यहीं से शुरूआत हुई बाल मन में डॉक्टर बनने की चाहत की। ग्रामीण परिवेश और हिंदी मीडियम स्टूडेंट होने के कारण शुरूआत में उन्हें कोई ये तक बताने वाला नहीं मिला कि डॉक्टर बनने के लिए कौन-कौन सी परीक्षाएं देने पड़ती है। कहते हैं जहां चाह वहां राह है। अपने सपने को पूरा करने के लिए बैग उठाकर भिलाई आ गए। यहां कई दिनों तक एक कोचिंग सेंटर से दूसरे कोचिंग सेंटर तक भटकते रहे। अंतत: किसी ने सचदेवा का नाम बताया तब जाकर उन्होंने एडमिशन लिया और चौथे ड्रॉप में सीजी पीएमटी में अंडर हंडरेट रैंक लाकर अपनी काबिलियत सिद्ध की। रायपुर मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद कैंसर रोग विशेषज्ञ के रूप में मेडिकल कॉलेज में अपनी सेवाएं देने वाले डॉ. आलोक कहते हैं कि एक बार किसी से सुना था कि मन लगाकर करोगे तो हर मंजिल हर कामयाबी मिलेगी। मेरे साथ भी यही हुआ। मन लगाया तो मंजिल अपने आप मिल गई। जब अपने संघर्षों को याद करता हंू तो एक अजीब सी खुशी होती है, क्योंकि वो कुछ कर गुजरने की चाहत ही थी जो मुझे एक छोटे से गांव से निकालकर इस मुकाम तक ले आई।
दो साल तक एक कोचिंग से दूसरे कोचिंग भटकता रहा
डॉ. आलोक ने बताया कि 12 वीं बोर्ड देकर जब पहली बार भिलाई आया तो यहां कोचिंग सेंटर के चक्कर लगाता रह गया। कई महीने तो ये जानने में निकल गए कि आखिर किस सेंटर में एडमिशन लूं। जब फाइनली तय करके मेडिकल एंट्रेस की तैयारी शुरू की तो कुछ भी समझ में नहीं आता था। लगता था दिमाग में सब गोल-गोल घूम रहा है। लैंग्वेज प्राब्लम भी होती थी। पहले दो साल तो बेसिक को समझने और उसे स्ट्रांग करने में निकल गया। इस बीच कई दोस्तों और साथ पढऩे वालों का सलेक्शन देखकर निराशा भी बहुत होती थी। कई बार घर वालों ने भी बोला कि अगर नहीं जम रहा तो कुछ और ट्राई कर लो पर मैं डटा रहा और आखिरकार सफलता मिल गई।
सचदेवा में पता चला क्या पढऩा है और कैसे पढऩा है
मेडिकल एंट्रेस की तैयारी सचदेवा न्यू पीटी कॉलेज से करने वाले डॉ. आलोक ने बताया कि बड़े एग्जाम को क्वालिफाई करने के लिए सही कोचिंग का मिलना भी बहुत जरूरी है। शुरुआत में भटकने के बाद जब मैं सचदेवा गया तो वहां जाकर सही मायने में करना क्या है, कैसे पढऩा है ये पता चला। यहां के एक्सपर्ट टीचर्स और सटीक स्टडी मटेरियल से कॉन्फिडेंस आया। यहां की सबसे अच्छी बात ये थी कि डाउट के लिए अलग से क्लास लगाया जाता था। साथ ही अगर क्लास में भी डाउट क्लियर न हो तो टीचर्स से आप कभी भी पूछ सकते थे। टेस्ट सीरिज तो मेन एग्जाम की तर्ज पर लिया जाता था। वहीं सचदेवा के डायरेक्टर चिरंजीव जैन सर की पर्सनल और गु्रप काउंसलिंग से काफी हिम्मत मिलती थी। वो हमेशा कहते थे कि जीवन में कुछ भी नामुमकिन नहीं है। बस चाहत होनी चाहिए उस मंजिल को पाने की। यहां का माहौल पढऩे के लिए बहुत ही अच्छा है।
लगन बहुत जरूरी है
नीट की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स से कहना चाहता हूं कि किसी भी काम को करने के लिए लगन बहुत जरूरी है। चाहे वो एग्जाम हो या फिर कोई अन्य काम। तैयारी के दौरान निराशा आती है लेकिन ये ज्यादा देर नहीं टिबींक सकती अगर आपके अंदर लगन है। अपनी सक्सेस के बारे में रोज सोचना चाहिए। क्योंकि जब हम किसी चीज को सोचते हैं तो उसे पूरा करने के लिए हमारा मन भी एकाग्रचित हो जाता है। चाहे कितनी भी असफलता क्यों न मिले अपनी तैयारी में जुटे रहे।

