स्टिल्ट + 4’ नीति पर PIL से राष्ट्रीय बहस तेज, अब सवाल मंजिलों से ज्यादा शहर की क्षमता का

स्टिल्ट + 4’ नीति पर PIL से राष्ट्रीय बहस तेज, अब सवाल मंजिलों से ज्यादा शहर की क्षमता का


🔴गुरुग्राम से बेंगलुरु तक शहरी विकास के मॉडल पर उठे सवाल, अधिवक्ता सुनील सिंह की जनहित याचिका बनी व्यापक विमर्श का आधार

सीजी न्यूज़ ऑनलाइन, 04 सितंबर 2026। देश के तेजी से बढ़ते महानगरों में अनियोजित शहरीकरण, बढ़ती आबादी और सीमित आधारभूत सुविधाओं के बीच अब शहरी विकास को लेकर बहस केवल इमारतों की ऊंचाई तक सीमित नहीं रह गई है। सवाल यह उठने लगा है कि अतिरिक्त आबादी का भार उठाने के लिए शहर की सड़क, सीवरेज, ड्रेनेज, जलापूर्ति, पार्किंग और आपातकालीन सेवाएं कितनी सक्षम हैं।

इसी व्यापक सवाल को केंद्र में लाने वाली अधिवक्ता सुनील सिंह की जनहित याचिका (PIL) ने हरियाणा की ‘Stilt + 4 Floors’ नीति को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी और नीतिगत विमर्श खड़ा किया है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में दायर CWP-PIL No. 212 of 2024, Sunil Singh vs. State of Haryana & Another में आवासीय भूखंडों पर स्टिल्ट पार्किंग के ऊपर चार मंजिलों के निर्माण की अनुमति से जुड़े शहरी नियोजन, आधारभूत ढांचे, पर्यावरण और सार्वजनिक सुरक्षा के मुद्दे उठाए गए।

हाईकोर्ट ने ‘स्टिल्ट + 4’ नीति पर लगाई अंतरिम रोक

2 अप्रैल 2026 को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए हरियाणा सरकार को आवासीय भूखंडों के लिए ‘Stilt + 4 Floors’ नीति पर आगे बढ़ने से रोक दिया। न्यायालय ने 2 जुलाई 2024 की संबंधित अधिसूचना के प्रभाव और संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई।

मामले में प्रस्तुत निरीक्षण रिपोर्ट में गुरुग्राम के कुछ आवासीय क्षेत्रों की जमीनी स्थिति भी सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार जहां आंतरिक सड़कों की निर्धारित चौड़ाई 10 से 12 मीटर थी, वहीं कई स्थानों पर वाहनों और पैदल आवागमन के लिए उपलब्ध मोटरेबल हिस्सा महज 3.9 से 4.8 मीटर पाया गया।

रिपोर्ट में सैनिटेशन और सीवरेज की कमी, अत्यधिक आबादी, दोषपूर्ण टाउन प्लानिंग, अपर्याप्त कचरा निस्तारण, भूजल पुनर्भरण में बाधा और अनियंत्रित निर्माण जैसी समस्याओं की ओर भी संकेत किया गया।

सवाल सिर्फ मंजिलों का नहीं, इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता का

PIL के जरिए मूल सवाल यह सामने आया कि यदि किसी आवासीय क्षेत्र में अतिरिक्त मंजिलों की अनुमति दी जाती है, तो उससे बढ़ने वाली आबादी का भार मौजूदा बुनियादी ढांचा उठा पाएगा या नहीं।

इसमें सड़क और पार्किंग क्षमता के साथ-साथ सीवरेज, जलापूर्ति, वर्षाजल निकासी, अग्निशमन, विद्युत व्यवस्था, आपातकालीन सेवाओं, खुले स्थान और पर्यावरणीय संतुलन जैसे विषय भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

यही वजह है कि मामले में ‘Infrastructure Capacity Audit’ की आवश्यकता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण बनकर सामने आया। न्यायिक हस्तक्षेप के बाद हरियाणा के Town and Country Planning Department को संबंधित प्राधिकरणों को आदेश के अनुपालन के निर्देश देने पड़े। विभाग ने Right of Way पर अतिक्रमण तथा स्टिल्ट क्षेत्र के अनधिकृत उपयोग और निर्माण जैसे विषयों को भी गंभीरता से चिन्हित किया।

व्यक्तिगत विवाद से आगे सार्वजनिक हित का मुद्दा

अधिवक्ता सुनील सिंह ने इस मामले को केवल संपत्ति अथवा पड़ोसी विवाद के तौर पर नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित, शहरी पर्यावरण और नागरिक सुरक्षा से जुड़े व्यापक विषय के रूप में न्यायालय के समक्ष रखा।

सुनील सिंह भारत के सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता रह चुके हैं और भारत सरकार के Standing Counsel के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। वे International Council of Jurists, London के सदस्य हैं तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Amicus Curiae के रूप में भी नियुक्त किए जा चुके हैं।

इस PIL ने यह सवाल प्रमुखता से उठाया कि शहरी विकास में भवनों की ऊंचाई बढ़ाने से पहले शहर की वास्तविक वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए।

गुरुग्राम से बेंगलुरु तक पहुंचा विमर्श

‘Stilt + 4’ मामले की प्रासंगिकता अब गुरुग्राम से आगे बढ़कर देश के अन्य तेजी से विकसित हो रहे महानगरों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। बेंगलुरु में भी Greater Bengaluru Governance Act के तहत नई प्रशासनिक एवं नियामकीय व्यवस्था विकसित की जा रही है और Building Bye-laws में बदलाव की प्रक्रिया चल रही है।

बेंगलुरु में भवन की ऊंचाई को सड़क की चौड़ाई से जोड़ने, पर्याप्त open space, तकनीकी मानकों, stilt parking और Floor Area Ratio (FAR) जैसे मुद्दे भी नियामकीय विमर्श का हिस्सा हैं।

हालांकि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का ‘Stilt + 4’ संबंधी आदेश सीधे बेंगलुरु या किसी अन्य राज्य पर लागू नहीं होता, लेकिन इससे उठने वाला मूल प्रश्न देश के सभी बड़े शहरों के लिए महत्वपूर्ण है—क्या infrastructure carrying capacity का आकलन किए बिना शहर में अतिरिक्त density और built-up area की अनुमति दी जानी चाहिए?

अब नीति-निर्माण के सामने पांच बड़े सवाल

इस पूरे विमर्श के बीच शहरी नियोजन को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आए हैं—

  • अतिरिक्त मंजिलों से कितनी अतिरिक्त आबादी बढ़ेगी?
  • मौजूदा सड़क और पार्किंग व्यवस्था कितना भार उठा सकती है?
  • सीवरेज और storm-water drainage की क्षमता कितनी है?
  • अग्निशमन और emergency response के लिए पर्याप्त पहुंच उपलब्ध है या नहीं?
  • क्या नई निर्माण अनुमति से पहले infrastructure capacity का वैज्ञानिक आकलन किया गया है?

इसके अलावा भूजल recharge, खुले स्थान, सार्वजनिक परिवहन और पर्यावरणीय प्रभाव को भी शहरी विकास की योजना में शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

‘शहर कितना ऊंचा हो’ से ज्यादा जरूरी—‘शहर कितना सक्षम हो’

शहरी विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं के लिए यह मामला इस मायने में महत्वपूर्ण है कि vertical development अपने आप में गलत नहीं है। सीमित भूमि और बढ़ती आबादी वाले महानगरों में नियोजित vertical growth आवश्यक हो सकती है। लेकिन इसके साथ सड़क, जल, सीवरेज, ड्रेनेज, पार्किंग, बिजली, सार्वजनिक परिवहन और आपातकालीन सेवाओं का विकास भी समान गति से होना जरूरी है।

सुनील सिंह की PIL ने इसी संतुलन के सवाल को न्यायिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। इसका महत्व केवल ‘Stilt + 4’ नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बहस इस बात पर केंद्रित हो गई है कि शहर का विकास केवल अधिक मंजिलों के निर्माण से नहीं, बल्कि उसकी वहन क्षमता और नागरिक सुविधाओं के अनुरूप होना चाहिए।

गुरुग्राम में शुरू हुई यह कानूनी बहस आने वाले समय में देश के अन्य महानगरों की भवन उपविधियों और urban planning frameworks के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकती है। भविष्य के शहरों के लिए असली सवाल अब यह नहीं कि इमारत कितनी ऊंची बनाई जा सकती है, बल्कि यह है कि उस ऊंचाई और घनत्व को संभालने के लिए शहर कितना तैयार है।