सीजी न्यूज़ ऑनलाइन, 26 अगस्त 2026। दुर्ग विश्वविद्यालय के कुलसचिव भूपेंद्र कुमार कुलदीप द्वारा अपने खिलाफ एफआईआर रद्द करने की मांग को लेकर दायर रिट याचिका को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायलाय ने बोर्ड पर ही निरस्त कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि कुलदीप ने अपने घर में खाना बनाने का काम करने वाली महिला शुभांगी मराठे को, अपने प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए विश्वविद्यालय में दैवेभो कर्मचारी के रूप में दो साल पहले नियुक्त कर लिया था महिला शुभांगी मराठे ने विश्वविद्यालय में कभी भी कोई काम नहीं किया । कुलदीप के निर्देश पर महिला सिर्फ महीने के अंतिम दिन विश्वविद्यालय आती थी और उपस्थिति पंजी में पूरे महीने का हस्ताक्षर करके जाती थी । वेतन आने पर कुलसचिव के निर्देशानुसार महिला 2200/- अपने खाते में रखती थी बाकी की रकम लगभग 9000/- रुपए कुलसचिव के सुपुत्र उदय प्रताप कुलदीप के खाते में ट्रांसफर कर देती थी।
जून महीने के अंत में जब महिला हस्ताक्षर करने आई तो उसी दिन उसने इसकी जानकारी विश्विद्यालय प्रशासन को दी तथा लिखित में आवेदन देकर पूरा वेतन दिलाने और विश्विद्यालय में कार्य पर नियोजित करने की मांग की।
महिला ने अपने पासबुक की छायाप्रति, शपथपत्र, bank स्टेटमेंट, UPI ट्रांजेक्शन ke सबूत भी प्रस्तुत किया
विश्वविद्यालय ने तथ्यान्वेषण समिति (फैक्ट फाइंडिंग कमेटी) गठित किया और समिति से सारे तथ्यों की जांच करवाई। फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट से स्पष्ट था कुलसचिव ने आपराधिक न्यास भंग का सुनियोजित अपराध किया है एसएसपी दुर्ग को कमेटी की रिपोर्ट सौंपकर उचित विधिक कार्यवाही करने का अनुरोध किया जिस पर कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप के विरुद्ध मोहन नगर थाने में 3 अगस्त को धारा 316(4) के तहत जुर्म दर्ज किया गया है।
इस FIR को रद्द करने की याचिका कुलसचिव ने उच्च न्यायालय में लगाई थी। साथ ही फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के गठन, उसकी रिपोर्ट को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका लगाई थी।
दोनों पक्षों के वकीलों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति विभु दत्ता गुरु ने यह कहते हुए कि “कुलाधिपति की पूर्व अनुमति की आवश्यकता तभी उत्पन्न होती है जब याचिकाकर्ता के विरुद्ध औपचारिक विभागीय जांच प्रारंभ की जाए। केवल तथ्य ज्ञात करने के लिए की गई प्रारंभिक जांच पर यह प्रावधान लागू नहीं होता।”
इसी प्रकार, ऐसी प्रारंभिक तथ्य-संग्रह जांच के चरण में याचिकाकर्ता नियमित विभागीय जांच में उपलब्ध सुनवाई के अधिकार का दावा विधिक अधिकार के रूप में नहीं कर सकता।
उपरोक्त कारणों से न्यायालय का मत है कि तथ्य-संग्रह जांच तथा उसके आधार पर प्रस्तुत प्रतिवेदन को चुनौती देना इस समय समयपूर्व (Premature) है। इसलिए संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट अधिकारिता का प्रयोग करते हुए इस न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप किए जाने का कोई आधार नहीं बनता।

