80.36 करोड़ की संपत्ति अटैचमेंट के खिलाफ हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज

80.36 करोड़ की संपत्ति अटैचमेंट के खिलाफ हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज


🔴मेडिकल कार्पोरेशन को दवा आपूर्ति करने वाली मोक्षित कार्पोरेशन दुर्ग का मामला

सीजी न्यूज ऑनलाइन 13 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग मामले में करीब 80.36 करोड़ रुपये मूल्य की 46 चल-अचल संपत्तियों की प्रोविजनल अटैचमेंट को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति विभु दत्ता गुरु ने कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) में अटैचमेंट के खिलाफ चुनौती देने के लिए पूरी वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है। ऐसे में इस चरण पर सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करना सुनवाई योग्य नहीं है।

मामला दुर्ग स्थित मेसर्स मोक्षित कार्पोरेशन और उसके साझेदारों से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार फर्म छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड को मेडिकल उपकरण, रिएजेंट और अन्य सामग्री की आपूर्ति करती थी।

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि फर्म को टेंडर नंबर 182 के तहत करीब 476.84 करोड़ रुपये की सामग्री की आपूर्ति का काम मिला था। उनके अनुसार अब तक करीब 205.07 करोड़ रुपये का भुगतान प्राप्त हुआ है, जबकि शेष राशि का भुगतान अभी बाकी है।

इसी बीच ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फर्म और संबंधित पक्षों की 46 चल-अचल संपत्तियों को प्रोविजनल रूप से अटैच किया। इसकी वैधता को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

सुनवाई के दौरान ईडी की ओर से प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराई गई। जांच एजेंसी ने कहा कि पीएमएलए में संपत्ति अटैचमेंट को चुनौती देने के लिए विस्तृत वैधानिक व्यवस्था मौजूद है। कानून की धारा 8 के तहत सबसे पहले अटैचमेंट की वैधता पर एडजुकेटिंग अथॉरिटी निर्णय लेती है।

इसके बाद उसके आदेश के खिलाफ धारा 26 के तहत अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील का प्रावधान है। अपीलीय स्तर के बाद धारा 42 के तहत हाई कोर्ट में जाने का रास्ता भी कानून में उपलब्ध है।

ईडी ने तर्क दिया कि जब यह वैधानिक प्रक्रिया उपलब्ध है और उसका इस्तेमाल किया जा सकता है, तब सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में याचिका दायर करना समय से पहले है।

हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई असाधारण आधार नहीं बता सके, जिसके कारण वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप करना जरूरी हो।

इसी आधार पर कोर्ट ने याचिका को ‘नॉट मेन्टेनेबल’ (सुनवाई योग्य नहीं) मानते हुए खारिज कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता पीएमएल के तहत उपलब्ध वैधानिक उपायों का इस्तेमाल कर सकते हैं और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपने सभी कानूनी एवं तथ्यात्मक आपत्तियां रख सकते हैं।