दुर्ग, 03 अगस्त 2026। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) भिलाई के वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने अपशिष्ट PET प्लास्टिक (पानी और पेय पदार्थों की बोतलों) को एक ऐसी उच्च-मूल्य वाली सामग्री में बदलने की तकनीक विकसित की है, जिसे बार-बार नया आकार दिया जा सकता है, मरम्मत की जा सकती है और दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। यह तकनीक भविष्य की 3D प्रिंटिंग के लिए भी बेहद उपयोगी मानी जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ शोध
यह शोध आईआईटी भिलाई के रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. संजीब बनर्जी के नेतृत्व में प्रियंक सिन्हा, भरतभूषण मेश्राम और ओंकारनाथ वर्मा ने किया है। शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल “Materials Today Catalysis” में प्रकाशित हुए हैं। इस तकनीक के लिए शोधकर्ताओं ने भारतीय पेटेंट के लिए भी आवेदन किया है।
नीलगिरी की पत्तियों से बनाया ग्रीन कैटेलिस्ट
शोधकर्ताओं ने सबसे पहले नीलगिरी की पत्तियों से एक पर्यावरण-अनुकूल (ग्रीन) उत्प्रेरक विकसित किया। यह उत्प्रेरक बेकार PET बोतलों को एक उपयोगी रासायनिक तत्व में बदलता है। इसकी खासियत यह है कि इसे चुंबक की मदद से अलग कर कई बार दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे पूरी प्रक्रिया अधिक किफायती और पर्यावरण हितैषी बन जाती है।
बार-बार बदल सकता है आकार
नई सामग्री की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गर्म करने पर इसे मनचाहे आकार में ढाला जा सकता है और ठंडा होने पर यह उसी आकार में मजबूत बनी रहती है। शोध के दौरान इसे कई बार अलग-अलग आकार में ढालकर परीक्षण किया गया, लेकिन इसके गुणों में कोई खास कमी नहीं आई।
3D प्रिंटिंग और इंजीनियरिंग में होगा उपयोग
शोधकर्ताओं के अनुसार यह सामग्री भविष्य में 3D प्रिंटिंग, एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग प्रोटोटाइप, शैक्षणिक मॉडल और पुनः उपयोग योग्य उपभोक्ता उत्पादों के निर्माण में उपयोगी साबित हो सकती है। इसकी मरम्मत और पुनः उपयोग की क्षमता प्लास्टिक कचरे को कम करने में भी मदद करेगी।
‘वेस्ट टू वेल्थ’ की दिशा में बड़ी पहल
आईआईटी भिलाई का यह नवाचार “वेस्ट-टू-वेल्थ” की अवधारणा को साकार करता है। यह तकनीक प्लास्टिक कचरे को मूल्यवान इंजीनियरिंग सामग्री में बदलने के साथ नए प्लास्टिक पर निर्भरता कम करेगी और कार्बन फुटप्रिंट घटाने में भी सहायक होगी।
सतत विकास को मिलेगा बढ़ावा
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक स्वच्छ भारत मिशन, आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और राष्ट्रीय संसाधन दक्षता नीति जैसे अभियानों को मजबूती देने के साथ-साथ प्लास्टिक प्रदूषण कम करने और सतत विनिर्माण (Sustainable Manufacturing) को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

