🔴अब तक 18 आरोपी सलाखों के पीछे, डॉक्टर, पुलिस, तहसील और बैंक कर्मियों तक फैला सिंडिकेट
सीजी न्यूज ऑनलाइन, 21 जुलाई 2026। बिलासपुर में सांप काटने से मौत के नाम पर करोड़ों रुपये के फर्जी मुआवजा घोटाले की जांच लगातार नए खुलासे कर रही है। सोमवार को इस मामले में दो पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के बाद अब तक कुल 18 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। गिरफ्तार आरोपियों में डॉक्टर, पुलिसकर्मी, तहसील कार्यालय के कर्मचारी, बैंक कर्मचारी और गिरोह का सरगना अधिवक्ता हीरा खांडेकर शामिल हैं। वहीं, फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में सिम्स के कुछ डॉक्टरों की तलाश जारी है।
पुलिस जांच के अनुसार यह पूरा गिरोह अस्पताल में किसी भी मौत की सूचना मिलते ही सक्रिय हो जाता था। प्राकृतिक या अन्य कारणों से हुई मौत को सांप काटने से हुई मौत बताकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे और शासन से मिलने वाली चार लाख रुपये की अनुग्रह सहायता हासिल कर ली जाती थी। इस राशि में से मृतक के परिजनों को कुछ हिस्सा देकर शेष रकम गिरोह के सदस्य आपस में बांट लेते थे।
जांच में सामने आया है कि बिलासपुर जिले में 431 मामलों में सांप काटने से मौत दर्शाकर 17 करोड़ 24 लाख रुपये की अनुग्रह सहायता का दावा किया गया। पुलिस का आरोप है कि इनमें बड़ी संख्या में प्राकृतिक मौतों को भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सांप काटने से हुई मौत बताकर सरकारी राशि निकाली गई। कई मामलों में मृतकों के परिजनों को यह तक जानकारी नहीं थी कि उनके नाम पर मुआवजा स्वीकृत हो चुका है।
पुलिस के मुताबिक, गिरोह का नेटवर्क सिम्स अस्पताल, पुलिस चौकी, तहसील कार्यालय और अन्य विभागों तक फैला हुआ था। सिम्स पुलिस चौकी में पदस्थ पुलिसकर्मी और होमगार्ड जवान शव आने की सूचना गिरोह तक पहुंचाते थे। इसके बाद गिरोह के सदस्य अस्पताल पहुंचकर मृतक के परिजनों को सरकारी मुआवजे का लालच देते और मौत का कारण सांप काटना बताने के लिए तैयार करते थे।
जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ मामलों में शव पर सांप के काटने जैसे निशान बनाने तक की कोशिश की गई। इसके बाद मर्ग पंचनामा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेजों में कथित हेराफेरी कर मुआवजा दावा तैयार कराया जाता था।
पुलिस के अनुसार तहसील कार्यालय में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी गोविंद विश्वकर्मा पूरे मामले का संचालन करता था। वह एक से डेढ़ लाख रुपये लेकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मुआवजा प्रकरण तैयार करवाता था। जांच में यह भी सामने आया कि तहसील और एसडीएम कार्यालय के रीडरों के लॉग-इन आईडी का इस्तेमाल कर कई प्रकरणों का ऑनलाइन निराकरण कराया गया।
सोमवार को गिरफ्तार किए गए पुलिस कर्मी रामकुमार पाटनवार और रामेश्वर भास्कर को गिरफ्तार किया गया है। दोनों घटना के दौरान सिम्स पुलिस चौकी में पदस्थ थे। पुलिस का आरोप है कि शव अस्पताल पहुंचते ही वे गिरोह के सदस्य महेंद्र मनहर को सूचना देते थे। इसके बाद वह मृतक के परिजनों से संपर्क कर उन्हें मुआवजे का लालच देकर सांप काटने से मौत का दावा करने के लिए तैयार करता था।
पुलिस दोनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर रिमांड पर लेकर पूछताछ करेगी।
जांच के दौरान कई फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और डॉक्टरों के कथित फर्जी हस्ताक्षर सामने आए हैं। पुलिस के अनुसार डॉ. प्रियंका सोनी के अलावा डॉ. एस.एन. बोले की भूमिका भी जांच के दायरे में है। बताया गया है कि डॉ. बोले छुट्टी समाप्त होने के बाद भी सोमवार को ड्यूटी पर नहीं लौटे। पुलिस ने उनके निवास पर भी दबिश दी है।
जांच में डॉ. आर.के. मरकाम के फर्जी हस्ताक्षर का भी मामला सामने आया है। रतनपुर थाना क्षेत्र के एक प्रकरण में हार्ट अटैक से हुई मौत को सांप काटने से हुई मौत दर्शाकर मुआवजा लेने का आरोप है। पुलिस जांच में कोनी थाना क्षेत्र के सभी सांप काटने से मौत के मामलों में प्रस्तुत दस्तावेजों पर संदेह जताया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मृत्यु सूचना और पटवारी प्रतिवेदन में भी गड़बड़ियां मिली हैं। तीन मामलों में से दो मृतकों के परिजनों ने पुलिस को बताया कि उन्हें यह तक पता नहीं था कि उनके नाम पर मुआवजा स्वीकृत किया गया है।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रजनेश सिंह ने कहा कि सांप काटने के मामलों में अधिवक्ता और उसके सहयोगियों द्वारा एक संगठित सिंडिकेट चलाया जा रहा था। जांच में जिस-जिस व्यक्ति की भूमिका सामने आएगी, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। अब तक मुख्य आरोपी अधिवक्ता, उसका रिश्तेदार, बैंक कर्मचारी, डॉक्टर, पुलिसकर्मी और तहसील कार्यालय के कर्मचारियों सहित कई आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है।
इधर, सोमवार को अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन के पदाधिकारियों ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की। संगठन का आरोप है कि कुछ कर्मचारियों को पूछताछ के लिए बुलाया गया था, लेकिन बाद में उन्हें सीधे गिरफ्तार कर हथकड़ी लगाकर न्यायालय में पेश किया गया। संगठन का कहना है कि यदि कोई दोषी है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो, लेकिन जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि अफसरों की भूमिका की भी जांच हो।

