क्या पिता अपनी पूरी संपत्ति किसी एक बेटे के नाम कर सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई है राह

क्या पिता अपनी पूरी संपत्ति किसी एक बेटे के नाम कर सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई है राह


सीजी न्यूज़ ऑनलाइन, 16 अप्रैल 2026। अक्सर परिवारों में संपत्ति विवाद बिखराव का कारण बनता है। सबसे पहले यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि संपत्ति किस प्रकार की है, कैसे ट्रांसफर की गई है और अन्य वारिसों के अधिकार क्या बनते हैं। यदि इस पहलू को समझ लें तो कई मामले आसानी से सुलझ सकते हैं। इस तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने समय समय पर राह दिखाई है।

परिवारों में अक्सर संपत्ति विवाद का मसला ऐसे झगड़े की जड़ बन जाता है, जो अदालतों में सालों चलता रहता है। इसकी वजह से परिवार के सदस्यों में कड़वाहट भर जाती है। कई मामलों में ऐसा होता है कि पिता ने वसीयत कर के सभी वारिसों को जायदाद और संपत्ति में बराबर हिस्सा दिया। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि पिता अपने निर्णय से या किसी एक बेटे के वशीभूत होकर या उससे ज्यादा लगाव के चलते अपनी पूरी संपत्ति उसके नाम कर देता है।

ऐसे में पिता के अन्य बेटे भी संपत्ति पर अपना हक जताते हैं और फिर मामला कोर्ट पहुंचता है। सवाल यह है कि जब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए कि पिता ने अपनी पूरी संपत्ति एक ही बेटे के नाम कर दी है, तो ऐसी स्थिति में कानूनी नजरिए से क्या किया जा सकता है?

क्या समाधान है इस विवाद का

सबसे पहले यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि संपत्ति किस प्रकार की है ? कैसे ट्रांसफर की गई है? अन्य वारिसों के अधिकार क्या बनते हैं? यदि इस पहलू को कोई समझ ले तो कई मामलों में संपत्ति विवाद आसानी से सुलझ सकता है। खासकर इस तरह के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने समय समय पर अपने फैसलों के जरिए जिस तरह की गाइडलाइंस तय किए हैं उसे समझने से कोई भी संपत्ति विवाद अपने शुरुआती स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है, अदालत जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

इस संवेदनशील विषय के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को समझना ज़रूरी है। सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि संपत्ति पैतृक यानि जो पिता से पहले की अर्जित की हुई है या पिता की खुद की जोड़ी गई। संपत्ति के प्रकार के आधार पर नियमों को जानने की जरुरत है।

पैतृक संपत्ति (Ancestral Property): यदि संपत्ति पैतृक है, तो पिता उसे अपनी मर्जी से केवल एक बेटे को नहीं दे सकते। यह संपत्ति पिता की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। पैतृक संपत्ति पर सभी कानूनी वारिसों मसलन, सभी बेटे, सभी बेटियाँ और कुछ मामलों में पत्नी का भी; जन्मसिद्ध अधिकार होता है। पिता इसे एक बेटे को नहीं दे सकते। यदि ऐसा करते हैं तो ऐसी स्थिति में अन्य वारिस अदालत में जाकर अपने हिस्से का दावा कर सकते हैं और किये गये संपत्ति ट्रांसफर को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।

स्व-अर्जित संपत्ति (Self-Acquired Property): लेकिन यदि संपत्ति पिता की स्व-अर्जित संपत्ति है, मतलब पिता ने अपने से, अपने संसाधनों से प्रापर्टी खरीदी है, तो देश का कानून उन्हें यह अधिकार देता है कि वे उसे अपनी इच्छा से किसी एक बेटे, सभी बेटे-बेटियों को या किसी और को दे सकते हैं। इसमें ध्यान देने वाली बात यह होनी चाहिए कि यह ट्रांसफर वसीयत (Will), गिफ्ट डीड (Gift Deed) या रजिस्टर्ड सेल के जरिए किया गया हो सकता है। अदालतों में ऐसे मामलों में अन्य वारिसों के पास आमतौर पर दावा करने का मजबूत कानूनी आधार नहीं होता।
साल 2005 में संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर देश में एक बड़ा बदलाव आया, 2005 के हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम से। उस बदलाव ने बेटियों के भी संपत्ति अधिकारों को पूरी तरह बदल दिया। इस हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम से पहले, पैतृक संपत्ति में जन्म से ही केवल बेटों को ही स्वतः अधिकार प्राप्त थे। बेटियों को इससे वंचित रखा गया था। इस संशोधन के बाद बेटियों को सह-भागीदार बना दिया गया, जिसका अर्थ है कि अब उनके पास पुत्रों की तरह ही पैतृक संपत्ति में अधिकार मिल गए। हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम के ये नियम हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख परिवारों पर भी लागू होते है। यहां तक कि कोई यदि विवाहित बेटी हैं, तब भी उसके अधिकार वही रहते हैं।

क्या है सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस
समय समय पर सुप्रीम कोर्ट के सामने कई ऐसे मामले आए जिससे पारिवारिक संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए दिशा निर्देश मिलते रहे। इनकी वजह से देश भर में संपत्ति विवाद के हजारों केसों को सुलझाने में मदद मिली। ऐसे ही कुछ खास केसों का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है।

दोराईराज बनाम दोराईसामी- 2026 के मामले में पारिवारिक संपत्ति का विवाद अदालत में पहुंचा, जहां पैतृक आय से संपत्ति खरीदी गई थी। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया कि यदि संपत्ति पैतृक आय से खरीदी गई है, तो उसे संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति माना जाएगा। न्यायालय ने कर्ता द्वारा की गई वसीयत को संदिग्ध मानकर खारिज कर दिया और उच्च न्यायालय के फैसले को सही ठहराया।
के.सी. लक्ष्मण बनाम के.सी. चंद्रप्पा गौड़ा 2022 के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि कोई भी पिता पैतृक संपत्ति को केवल ‘किसी एक बच्चे से ही प्यार और स्नेह’ के वशीभूत होकर उसको उपहार में नहीं दे सकते। लेकिन धार्मिक या चैरिटी के उद्देश्यों के लिए कुछ मामलों में ये संभव है। इसे अन्य बच्चे चाहें तो पिता के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा 2020 वाले विवाद मे सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि परिवार में बेटियों का भी हक है। बेटियों का पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार है, चाहे वह 2005 के कानून संशोधन से पहले पैदा हुई हों या बाद में। ऐसे में पिता यदि अपनी पैतृक संपत्ति के बंटवारे से बेटियों को बाहर रखते हैं तो इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

डी.एस. लक्ष्मैया और अन्य बनाम एल. बालासुब्रमण्यम और अन्य 2003 के विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने स्व-अर्जित संपत्ति को परिभाषित किया। यदि कोई संपत्ति किसी सदस्य द्वारा अपनी आय से खरीदी गई है तो वह उसकी स्व-अर्जित संपत्ति मानी जाती है, भले ही वह उस समय परिवार के साथ रह रहा हो। इसके लिए जरूरी है कि संपत्ति बिना संयुक्त परिवार की संपत्ति की सहायता के ली गई हो। इस स्थिति में यदि पिता अपनी संपत्ति को किसी एक बेटे को दे सकते हैं।
विवादों के निपटारे में मदद
समय समय पर आए सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले, परिवारों में संपत्ति विवादों को निपटाने में बहुत सहायक साबित हुए। सुप्रीम कोर्ट की दी गाईडलाइंस से यह तय करने में बड़ी मदद हुई कि किसी व्यक्ति की अपनी परिश्रम से अर्जित की गई संपत्ति पर गलत तरीके से पैतृक अधिकारों का दावा करके विवाद करना सही नहीं है। साथ ही किसी पैतृक संपत्ति में किसी एक बेटे को ही प्यार या स्नेह के नाम पर उपहार दे कर दूसरे बेटे – बेटियों का हक नहीं मारा जा सकता है।